देवबन्दियों का तबरी2️⃣3️⃣
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 23*
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*(99) देवबन्दियों का तबरी...*
क़ासिम नानौतवी की नानी साहिबा के मुताल्लिक़ लिखते हैं- "जिस मरीज़ को तीन साल मर्ज़ इस हाल में इस तरह गुज़रे कि करवट बदलना भी दुश्वार हो। तो उसके मुताल्लिक़ ये ख़्याल बे मौक़ा न था कि बिस्तर की बदबू धोबी के यहाँ भी न जाएगी। मगर देखने वालों ने देखा कि गुस्ल के लिए चारपाई से उतारने पर पोतड़े (पाखाना लगे हुए कपड़े) निकाले गये जो नीचे रख दिये जाते थे तो उनमें बदबू की जगह ख़ुश्बू और ऐसी निराली महक फूटती थी कि एक दूसरे को सुँघाता और हर मर्द औरत ताअ़ज्जुब करता, चुनाँचे बगै़र धुलाये उनको तबर्रुक बनाकर रख लिया गया।"
*📚(तज़किरतुल ख़लील, सफ़ह- 96/97, तहरीर: आशिक़ इलाही मेरठी)*
*तबसरह :-* हालाँकि देवबन्दी उलमा और पीरों के मरने के बाद उनके चेहरे नहीं दिखाये जाते। अभी कुछ अर्सा पहले मौलवी खान मुहम्मद कन्दियाँ वाले जिसे खत्में नबूवत का सरखेल कहा जाता है, वफ़ात पा गए तो उनका मुहँ भी न दिखाया गया। तफ़सील के लिए मुफ़्ती फैज़ अहमद उवैसी साहब की किताब "गुस्ताख़ों का बुरा अन्जाम" का ज़रूर मुतालआ़ करें?
*(100) क़ुरआन में लफ़्ज़े तहरीफ़ (तबदीली रद्दोबदल)*
"मैं (अनवर शाह) कहता हूँ कि लाज़िम आता है ऊपर इस मज़हब के, कहो कि क़ुरआन भी तहरीफ़ शुदा क्यूँकि बेशक मआनवी नहीं है थोड़ी इसमें भी और जो बात साबित है- मेरे नज़दीक ये है, कि तहरीफ़ है। इसमें लफ़्ज़ी भी ताहम ये जो है इरादे से है इनके (सहाबा के) या मुग़ालते (ग़लती) से है। बस अल्लाह ख़ूब जानता है ये बात।"
*📚(फैज़ुल बारी, जिल्द- 3, सफ़ह- 398, तहरीर: अनवर शाह कशमीरी)*
*तबसरह:-* अगर मौलवी साहब की इस बात को मान लिया जाये तो फिर अल्लाह तआ़ला का ये फरमान कि "हमने इसे नाज़िल किया और हम ही इसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं, और ये वो किताब है जिसमें कोई शक नही" का क्या बनेगा। और अगर क़ुरआन में लफ़्ज़ी तहरीफ़ मान ली जाए तो किस चीज़ पर ईमान लाया जायेगा ? फ़िर क़ुरआन और दूसरी किताब में क्या फ़र्क़ रह गया।
*(101) हज़रते अली रदिअल्लाहु अन्हु ने सैयद अहमद को नहलाया और सैयदा फ़ातिमा रदिअल्लाहु अन्हा ने कपड़े पहनाए*
*(म'आज़ अल्लाह)*
सैयद साहब ने एक रोज़ ख़्वाब में विलायत मआ़ब हज़रते अली करम अल्लाहु वज्हु और हज़रते सैयदा फ़ातिमा रदिअल्लाहु अन्हा को देखा। हज़रते अली ने आपको अपने दस्ते मुबारक से ग़ुस्ल दिया और अपने हाथ मुबारक से सैयद साहब की ख़ूब शस्तो-शू (सफ़ाई) की जैसे माँ-बाप अपने बच्चे को नहलाते वक़्त करते हैं और हज़रते फ़ातिमा रदिअल्लाहु अन्हा ने आपको उम्दा लिबास पहनाया...
*📚(सिराते मुस्तक़ीम (उर्दू) सफ़ह- 189, मतबुआ़ कुतुबखाना रहीमिया देवबन्द, तहरीर: इस्माईल देहलवी)*
*तबसरह:-* इस पर क्या तबसरह लिखा जाये कि सैयदुन्निसा रदिअल्लाहु अन्हा की शान में कितनी बड़ी गुस्ताख़ी है कि उन्होंने 25 साला शाह साहब को ग़ुस्ल के बाद कपड़े पहनाए। शायद इसी लिये पठानों ने इस बदबख़्त ईस्माईल देहलवी को वासिले जहन्नम कर दिया।
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