उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद* *व हक़ाइक़0️⃣3️⃣
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 03*
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*(5) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वालिदैन मुसलमान नहीं*
*(मआज़ अल्लाह)*
*सवाल:-* हमारे हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वालिदैन मुसलमान थे या नहीं ?
*जवाब:-* "हज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वालिदैन के ईमान में इख़्तिलाफ़ है हज़रत इमाम साहब का मसलक है कि उनका इन्तिक़ाल हालते कुफ़्र में हुआ"
*📚(फ़तावा रशीदिया, सफ़ह- 245, तहरीर रशीद अहमद गंगोही)*
*तबसरह:-* लानत है, ऐसे गन्दे अक़ीदे पर जो इन देवबंदियों, वहाबियों का रसूले करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वालिदैन करीमैन रदियल्लाहु तआ़ला अन्हु के मुताल्लिक़ है- "अल्लाह तआ़ला ने फ़रमाया काफ़िर तो नापाक ही है"
*📚(सूरतुत्तौबा, आयत न. 28)*
और नबीए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया "मैं हमेशा पाक मर्दों की पुश्तों से पाक बीवियों के पेटों में मुन्तक़िल होता रहा"
*📚(शरह अल ज़रकानी अली अल् मवाहिबुल्लदुनिया ब-हवाला अबी नईम अन् इब्ने अब्बास)*
लिहाज़ा वालिदैने मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को काफ़िर मानना बजाते ख़ुद कुफ़्र है इससे आप उन लोगों के ईमान का अन्दाज़ा लगा सकते हैं- देवबंदियों के मौलवी मुफ़्ती अज़ीजुर्रहमान उसमानी मुफ़्तीए अव्वल दारुल उलूम देवबन्द फ़तावा दारुल उलूम देवबन्द (मतबुआ़ मकतबा हक़्क़ानिया मुल्तान जिल्द-3, सफ़ह- 163 फ़तवा न. 832) में लिखते हैं
*सवाल:-* एक शख़्स ऐलानिया ये कहता है के, अन'हज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बुत परस्त यानी मुशरिक की औलाद हैं और काफ़िर के मकान में पैदा हुए ऐसे शख़्स के पीछे नमाज जाइज़ है या नहीं ?
*जवाब:-* एक हदीस शरीफ़ में ये मजमून आया है के एक शख़्स ने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अपने बाप का और आपके बाप का हाल दरयाफ़्त किया तो आपने फ़रमाया के मेरा और तेरा बाप दोज़ख में है (इस हदीस का कोई हवाला पेश नहीं किया गया)
आगे जाकर लिखता है कि बाज़ रिवायात ऐसी भी नक़ल हैं जिनमें आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के वालिदैन का दोबारह ज़िन्दा होकर ईमान लाना साबित किया। इन रिवायात में से मुसलमान किस रिवायात को ज़्यादह तरज़ीह देगा ? लेकिन इनके दोरंगी अक़ीदह नम्बर- 31 में देखी जा सकती है
*(6) रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जैसा इल्मे ग़ैब, ऐसा इल्मे गै़ब बच्चों, जानवरों और पागलों को भी हासिल है।*
*(मआज़ अल्लाह)*
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"फिर ये कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ाते मुकद्दसा पर इल्मे गै़ब का हुक्म किया जाना अगर बक़ौल जैद सही हो तो दरयाफ़्त तलब ये अम्र है कि उस गै़ब से मुराद बाज़ गै़ब है या कुल गै़ब अगर बाज़ उलूमे गै़बिया मुराद है तो उसमें हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ही की क्या तख़्सीस (खुसूसियत) है, ऐसा इल्मे गै़ब तो जैद व उमर बल्कि हर सबी (बच्चे) व मजनून (पागल) बल्कि जमीअ़ हैवानात व बहाएम (जानवर और चौपाए) के लिए भी हासिल है"
*📚(हिफ़्जुल ईमान सफ़ह - 13. मतबुआ़ क़दीमी कुतुबखाना मक़ाबिल आरामबाग कराची तहरीर: अशरफ़ अली थानवी)*
*(7) हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ख़ातमुन्नबीयीन (आख़िरी नबी) होने का इन्कार, ख़त्मे नबुवत पर डाका*
"अगर बिलफ़र्ज़ बाद जमानए नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कोई नबी पैदा हो तो फिर भी ख़ातमियते मुहम्मदी (हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आखिरी नबी होने) में फ़र्क़ न आयेगा" *(सफ़ह-25)* "अगर बिल फ़र्ज़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाने में या बिल फ़र्ज़ आपके बाद भी कोई नबी फर्ज़ किया जाए तो भी ख़ातमियते मुहम्मदिया (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (हुज़ूर के आख़िरी नबी होने) में फ़र्क़ न आयेगा" *(सफ़ह-13)* अव्वल तो मानी खातमुन्नबीयीन मालूम करने चाहिए ताकि फ़हमे जवाब में कुछ वक़्त न हो सो अवाम के ख़्याल में तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ख़ातिम होना बई'मानी है के आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जमाना अम्बिया-ए साबिक़ा के ज़माने के बाद और आप सब में आखिरी हैं। मगर अहले फ़हम पर रौशन होगा कि तकददुम या ताखीरे ज़मानी (जमाने के लिहाज़ से पहले या बाद में आना) में बिज़्ज़ात कुछ फ़ज़ीलत नहीं।
*📚(तहज़ीरुन्नास, सफ़ह-3 मतबुआ़ कुतुबखाना रहीमिया देवबन्द, तहरीर: क़ासिम नानौतवी बानिए दारूल उलूम देवबन्द)*
*तबसरह:-* मिर्ज़ाई आज भी इसी किताब का हवाला देकर साबित करने की कोशिश करते हैं कि मिर्ज़ा का दावए नबूवत इस इबारत के मुताबिक़ था।
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