अम्बिया की शान में एक और गुस्ताख़ी0️⃣6️⃣
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 06*
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*(19) अम्बिया की शान में गुस्ताख़ी*
*(म'आज़ अल्लाह)*
"अम्बिया अपनी उम्मत से मुम्ताज़ होते हैं तो उलूम ही में मुमताज़ होते हैं बाक़ी रहा अ़मल उसमें बसा अवकात बज़ाहिर उम्मती मसावी (बराबर) हो जाते हैं, बल्कि बढ़ जाते हैं"
*📚(तहज़ीरून्नास, सफ़ह-5, तहरीर: क़ासिम नानोतवी)*
*तबसरह:👉🏻* इस गन्दे अक़ीदे के रद में वैसे तो बेशुमार अहादीस पेश की जा सकती हैं लेकिन इख़्तिसार के तौर पर एक हदीस शरीफ़ बयान की जाती है
*"हज़रत अब्दुल्लाह दिन उमरू रदि अल्लाहु त'आ़ला अन्हु"* बयान करते हैं मैंने *नबी-ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* को बैठकर नमाज़ पढ़ते हुए देखा। मैंने अपना हाथ *आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* के सरे अकदस़ पर रखा तो आपने फ़रमाया ऐ अब्दुल्लाह बिन उमरू क्या बात है ? मैनें अर्ज़ की, या रसूलुल्लाह मुझे ये बताया गया है कि *आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* ने फ़रमाया है कि बैठकर नमाज पढ़ने वाले को निस्फ़ (आधा) सवाब मिलता है, जबकि आप ख़ुद बैठकर नमाज़ पढ़ रहे हैं। *आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* ने फ़रमाया (ये बात) ठीक है लेकिन, मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ (यानि अज्रो-सवाब के आम उसूलों का इतलाक़ मेरी ज़ात पर नहीं होता है)
*📚(मुस्लिम शरीफ़, जिल्द-1 किताब सलातुल मुसाफ़िरीन व कसरहा)*
अब इस हदीसे मुबारका को और देवबन्दियों के उस गंदे अक़ीदे, कि उम्मती आमाल में नबी से भी बढ़ जाता है, ख़ुद फैसला करें कि ये अम्बिया की शान में तौहीन है या नहीं ? कि एक उम्मती को नबी से अफ़ज़ल कह दिया। हमारा अक़ीदा है *"वली कितने ही मरतबे वाला हो, किसी सहाबी के बराबर नहीं हो सकता और सहाबी कितने ही बड़े मरतबे वाले हों किसी नबी के बराबर नहीं हो सकते* और जो किसी गै़रे नबी को किसी नबी से अफ़ज़ल या बराबर बताए *काफ़िर* है।
*(20) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पुल सिरात से गिरने से बचा लिया*
*(म'आज़ अल्लाह)*
(असल इबारत फ़ारसी में है जिसका तर्जुमा यूँ है) "मैंने ख़्वाब देखा कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पुलसिरात से गिर रहे हैं तो मैंने उन्हें बचा लिया।
*📚(बलग़तुल हैरान, सफ़ह-8, मतबुआ़ मक्तबा उख़ूवत लाहौर, तहरीर: हुसैन अली देवबन्दी)*
*तबसरह:👉🏻* ये बात ज़हन नशीन कर लें कि पुल'सिरात जहन्नम के ऊपर एक पुल है जिसके ऊपर से तमाम इंसानों *(हज़रते आदम अलैहिस्सलाम से क़यामत तक आने वाले लोगों)* को गुज़रना होगा। देवबन्दी मियाँ का मतलब है कि *(मआज़ अल्लाह, सुम्मा म'आज़ अल्लाह)* नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जहन्नम में गिरने वाले थे मैंने उन्हें बचा लिया।
*(21) नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपने अंजाम का इल्म नहीं और देवबन्दी मियाँ आने वाले हर चीज़ का बता सकते हैं*
*(म'आज़ अल्लाह)*
"अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम" को अपने अंजाम और दीवार के पीछे का इल्म नहीं" *(म'आज़ अल्लाह)*
*📚(बराहिने क़ातिया, सफ़ह-51, तहरीर: ख़लील अहमद अम्बेठवी)*
*तबसरह:-* ख़्वाजा अज़ीजुल हसन देवबन्दी और मौलवी अब्दुल हक़ देवबन्दी अशरफुल सवानेह, जिल्द-1 सफ़ह-47, मतबुआ़ इदारा तालीफ़ाते अशरफिया इशाअ़त रबीउल अव्लल 1427 हिजरी में रकम तराज़ हैं कि अशरफ़ अली थानवी देवबन्दी के वालिदे माजिद को मर्ज़े खारशत हो गया था और किसी दवा से फ़ायदा न होता था। एक डाॅक्टर ने इस मर्ज़ की एक अक्सीर दवा दी मगर कातिउन्नस्ल है (जिससे आइन्दा नस्ले इंसानी पैदा न हो यानी नामर्द बना देने वाली) वालिद साहब इस मर्ज़ से तंग थे, उन्होंने दवा लेकर खा ली। जब वालिदा साहिबा को पता चला तो सख़्त परेशान हुईं और ख़बर नानी जान तक भी पहुँच गई। एक दिन हाफिज़ गुलाम मुर्तज़ा मज़्जूब पानीपती तशरीफ़ लाए तो उनसे नानी जान ने शिकायत की, कि हज़रत मेरी इस लड़की (थानवी साहब की वालिदा) के लड़के जिन्दा नहीं रहते। हाफिज़ साहब ने बतरीक़ मुअ़म्मा (पहेली) फ़रमाया कि उमर व अली की कशाकशी में मर जाते हैं। अबकी बार अली के सुपुर्द कर देना, ज़िन्दा रहेगा।
*🔜 इन्शा'अल्लाह पोस्ट कल इसके आगे से होगी।*
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