देवबन्दियों का नया कलमा और दुरूद 0️⃣7️⃣
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 07*
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*(22) देवबन्दियों का नया कलमा और दुरूद*
*(म'आज़ अल्लाह)*
अशरफ़ अली थानवी के एक मुरीद ने सवाल भेजा कि मैंने ख़्वाब में कलिमए तैय्यबा की जगह *ला इलाहा इल्लल्लाह अशरफ़ अली रसूलुल्लाह* पढ़ा फिर वो बेदार हो गया और सोचा ख़्वाब में कलिमा ग़लत पढ़ा ग़लती के तदारुक में मुझे दुरूद शरीफ़ पढ़ना चाहिए। लेकिन जब दुरूद पढ़ने की कोशिश की तो ये पढ़ दिया- *"अल्लाहुमा सल्ले अल्ला सैयदना व नबियेना अशरफ़ अली"* थानवी साहब बजाए उसे ये कहने के कि तुमने कलमा और दुरूद ग़लत पढ़ा है, तौबा करो। फ़रमाते हैं कि इस वाक़ए में तस्सली थी कि जिसकी तरफ़ तुम रूजू करते हो वो बऔ़ना तआ़ला तबाए सुन्नत है"
*📚(रिसाला अल इम्दाद, माह सफ़र 1336 हिजरी, सफ़ह-37, तहरीर: अशरफ़ अली थानवी)*
*तबसरह:-* किस अंदाज में *अल्लाहुम्मा सल्ले अला सैयदना व नबीयेना अशरफ़ अली और लाइलाह इल्लल्लाह अशरफ़ अली रसूलुल्लाह* की तसदीक़ कर दी। क्या ये ख़त्मे नबूव्वत पर डाका नहीं ? या इससे झूठे दावए नबूव्वत की बू नहीं आती? खत्मे नबूव्वत कान्फ्रेन्स कराने वाले अपने उलमा की इन इबारत को लोगों के सामने क्यूँ नहीं लाते ?
*(23) अम्बिया-ए किराम और औलिया "अल्लाह" की शान में गुस्ताख़ी*
*(म'आज़ अल्लाह)*
"अल्लाह के रू-बरू सब अम्बिया और औलिया एक ज़र्रए नाचीज़ (सबसे कम हैसियत वाला ज़र्रह) से भी कमतर हैं।"
*📚(तक़वीयतुल ईमान, सफ़ह-74)*
*तबसरह:-* इनका ये अक़ीदा भी क़ुरआन व हदीस के सरासर खिलाफ़ है और कितनी ख़बासत और बेईमानी है, जिन हस्तियों के बारे में अल्लाह त'आ़ला क़ुरआने पाक में इर्शाद फरमाता है- *"अल्लाह ने इब्राहीम को अपना ख़लील और दोस्त बनाया"* और फ़रमाया- *"मूसा अलैहिस्सलाम "अल्लाह" के नज़दीक इज़्ज़तो-आबरू वाले थे* और फ़रमाया- *"हज़रते ईसा दुनिया व आख़िरत में वज़ीह हैं"* ये हस्तियाँ किस क़द्र अज़ीम, महबूब और ज़लीलुलक़द्र और अर्फ़ा व आला वज़ाहत की मालिक हैं और फ़िर अल्लाह के ख़लील और महबूब जैसी मुक़द्दस हस्तियों का मर्तबा एक ज़र्रए नाचीज़ बताना, कितनी बड़ी हिमाक़त और गुस्ताख़ी है, जिन हस्तियों के क़दम लगने से पहाड़ियां अल्लाह की निशानियाँ बन जाएं और इर्शाद फ़रमाया- *"बेशक सफ़ा और मर्वह पहाड़ी, अल्लाह की निशानियों में से हैं"*
और हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इर्शाद फ़रमाया *"मैं अल्लाह का हबीब हूँ"*
*📚 (तिर्मिज़ी, मिश्कात)*
*(24) रसूल के चाहने से कुछ नहीं होता*
*(म'आज़ अल्लाह)*
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(तक़वीयतुल ईमान मअ़ तज़कीरूल अख़्वान, सफ़ह - 77. तहरीर: इस्माईल- देहलवी) इस मौलवी से ये पूछा जाए कि क़िब्ला किसकी ख़्वाहिश पर तब्दील हुआ ? जिसका ज़िक्र क़ुरआन पाक में भी मौजूद है। नमाजें और रोज़े किसके चाहने से कम हुए और वहाँ कौन वसीला बना ? गुस्ताखाना अक़ीदे के रद में ये हदीस शरीफ़ काफ़ी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इर्शाद फ़रमाया *"ऐ लोगों बेशक अल्लाह ने तुम पर हज फर्ज़ कर दिया है* तो अफ़रा बिन हाबिस खड़े हो गए और अर्ज की, कि *या रसूलुल्लाह क्या हर साल हज फर्ज़ है ?* तो *आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* ने फ़रमाया कि अगर *मैंने हाँ कर दी तो हो जाएगा* और अगर हर साल हज फर्ज़ हो गया तो तुम इसकी अदायगी की ताक़त नहीं रखते"
*📚(मिश्क़ात-निसाई-दारमी)*
*(25) हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इल्म मलकुल मौत से ज़्यादह नहीं*
*(म'आज़ अल्लाह)*
"आले इल्लीयीन में रूह मुबारक अलैहिस्सलाम की तशरीफ़ रखना और मलकुल मौत से अफ़ज़ल होने की वजह से हरगिज़ साबित नहीं होता कि इल्म *आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* का उन उमूर (कामों) में बराबर भी हो (यानी ज़्यादह होना तो दूर की बात बराबर भी नहीं हो सकता)"
*📚(बराहिने क़ातिया, सफ़ह-52, तहरीर: ख़लील अहमद अम्बेठवी)*
*(26) शफाअ़ते मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इन्कार जिसका बयान दर्जनों अहादीस में है-*
*"नबी* और *वली* को *अल्लाह* की मख़्लूक़ जानकर वकील और सिफ़ारिशी समझने वाला, मदद के लिए पुकारने वाला, नज़्रो-नियाज़ करने वाला मुसलमान और काफ़िर अबू जहल, शिर्क में बराबर है"
*📚(तक़वीयतुल ईमान मअ़ तज़कीरूल अख़्वान, सफ़ह-10, तहरीर: इस्माईल देहलवी)*
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