अफ़्आ़ले क़बीहा (बुरे काम) मक़दूरे बारी तआ़ला (अल्लाह की क़ुदरत में यानी अल्लाह कर सकता) है" 0️⃣9️⃣

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 09*
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*(32) अल्लाह तआ़ला अफ़आ़ले क़बीहा (बुरे काम) कर सकता है..*

                    *(म'आज़ अल्लाह)*

"अफ़्आ़ले क़बीहा (बुरे काम) मक़दूरे बारी तआ़ला (अल्लाह की क़ुदरत में यानी अल्लाह कर सकता) है"
 
   *📚(अलहैदुल मक़ल, सफ़ह- 41, तहरीर: महमूदुल हसन देवबंदी)*

*तबसरह:-* अस्तग़फिरुल्लाह ! ऐसा गन्दा अक़ीदा वह भी ज़ाते बारी तआ़ला के लिए, जिसका अपना इरशाद है "तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए, जो तमाम जहानों का पालने वाला है" 

             *📚 (सूरह फ़ातिहा)* 

मुसलमानों का अक़ीदा ये है कि अल्लाह तआ़ला, हर ऐब, नुक़्स और ख़ामी (कमी / ख़राबी) से पाक है।

*(33) रसूल, जिन और मलाइक़ा को ताग़ूत (शैतान) बोलना जाइज़ है...*

                    *(म'आज़ अल्लाह)*

   "इस मानी बमौजिब ताग़ूत जिन और मलाइक़ा और रसूल को बोलना जाइज़ होगा"

    *📚(बलग़तुल हैरान, सफ़ह- 43, तहरीर: हुसैन अली देवबंदी)*

*तबसरह :👉🏻* फ़ीरोज़ुल्लुग़ात में ताग़ूत के मानी शैतान लिखे हैं तो इनके अक़ीदे के मुताबिक़ अल्लाह के फ़रिश्ते और रसूल जो हर गुनाह से पाक है, शैतान हैं। (म'आज़ अल्लाह) और शैतान का क्या काम इसी बलग़तुल हैरान मे अगली आयत का तरजुमा करते हुए लिखता है कि शैतान उनको नूर (अच्छाई) की तरफ़ नहीं जाने देता। अगर ये कुछ नूर देख भी लें तो फ़िर भी शैतान उन्हें उस तरफ़ नहीं जाने देता। *(सफ़ह -43)* पता चला कि इन लोगों का भी यही हाल है कि इन बुरे अक़ाइद के पढ़ने के बावजूद शैतान इन्हें अच्छे अक़ाइद की तरफ़ नहीं जाने देता, इसलिए कि ये है ही देवबन्दी, (यानी शैतान के पैरोकार)

*(34) देवबंदियों को क़ल्बी (दिली) सुकून काबा में नहीं बल्कि गंगोह में मिलता है*

                     *(म'आज़ अल्लाह)*

"फिरे ये काबा में भी पूछते गंगोह का रास्ता...... जो रखते अपने सीनों में ये ज़ोको- शौक़े इरफ़ानी"

    *📚(मर्शिया गंगोह, सफ़ह- 10, मतबुआ़ कुतुबखाना रहीमिया देवबंद, तहरीर: महमूदुल हसन देवबन्दी)*

*तबसरह:-* हर मुसलमान को काबा शरीफ़ जाकर सुकून मिलता है, लेकिन ये कहते हैं कि हम काबे में भी गंगोह का रस्ता पूछते थे, किस क़दर बदबख़्त लोग हैं जिनको काबा पहुँचकर मदीना शरीफ़ की हाज़िरी का भी ख़्याल न आया। अगर उनको रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुहब्बत होती तो गंगोह की बजाय मदीना शरीफ़ का नाम लेते।

*(35) लफ़्ज़ "रहमतुल लिल्-आलमीन" सिफ़्ते ख़ास्सह (वह सिफ़्त जो किसी एक के लिए ख़ास मानी जाए) रसूल्लल्लाहु सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नहीं*

*सवाल:-* क्या फ़रमाते हैं उलमा-ए दीन, कि रहमतुल लिल-आ़लमीन मख़्सूस आंहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से है या हर शख़्स को कह सकते हैं ?

*जवाब:-* लफ़्ज़ रहमतुल-लिल-आ़लमीन सिफ़्ते ख़ास्सह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नहीं बल्कि दीगर औलिया व अम्बिया और उलमा ए रब्बानियीन मौजिब रहमते आलम होते हैं, अगरचे *जनाब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* सबमें आला हैं। लिहाज़ा अगर दूसरे पर इस लफ़्ज़ को बतावील बोल देवें तो जाइज़ है फ़कत!! 

  *📚(फ़तावा रशीदिया, सफ़ह-245, तहरीर: रशीद अहमद गंगोही)*

*तबसरह:-* हालाँकि रूहुल्लाह हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम के लिए, ख़लीलुल्लाह हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए, कलीमुल्लाह हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम के लिए, और रहमतुल– लिल–आ़लमीन सिर्फ़ नबी-ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ मख़्सूस है। ये किसी और के लिए बोलना जाइज़ नहीं। हक़ीक़तन ये लोग अपने मौलवियों को नबी साबित करना चाहते हैं। एक और हवाला मुलाहिज़ा फ़रमाएं "जिस वक़्त से हज़रत गंगोही को हज़रत हाजी (इम्दादुल्लाह मुहाजिर मक्की) की वफ़ात की ख़बर मिली है. कई रोज़ तक मौलाना गंगोही को दस्त आते रहे, इस क़दर रन्ज और सदमा हुआ था कि हजरत गंगोही हज़रत (हाजी साहब) की निस्बत बार-बार रहमतुल - लिल् आलमीन फ़रमाते थे'। 

  *📚(मलफ़ूज़ाते हकीमुल उम्मत, जिल्द -1, सफ़ह-138 अज़ अशरफ़ अली थानवी)*

तो ये इबारतें पढ़िये और बार-बार तौबा कीजिए।

*(36) सैयदा फ़ातिमा तुज़-ज़हरा रदियल्लाहु तआ़ला अन्हा की शान में गुस्ताख़ी*

"इन हज़रत की तो हर बात में कशिश होती है एक मर्तबा फ़रमाया कि हम एक दफ़ा बीमार हो गए। हमको मरने से बहुत डर लगता है, हमने ख़्वाब में देखा कि हज़रते फ़ातिमा रदिअल्लाहु अन्हा ने हमको अपने सीने से चिम्टा लिया, हम अच्छे हो गए"

 *📚 (अल्अफ़ाज़ातुल यौमिया, अशरफ़ अली थानवी देवबन्दी)*

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