सैयदना इमाम हुसैन रदिअल्लाहु तआ़ला अन्हु की शान में गुस्ताख़ी* 0️⃣9️⃣A

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 09-A*
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*(37) सैयदना इमाम हुसैन रदिअल्लाहु तआ़ला अन्हु की शान में गुस्ताख़ी*

मौलवी हुसैन अली देवबन्दी लिखता है कि "कोर कोराना मर दूर करबल.... तानीफ़ती चूँ हुसैन अन्दर बला।" 

*तर्जुमा:-* ऐ अन्धे-अन्धा होकर करबला में न जाना ताकि इमामे हुसैन की तरह मुसीबत में गिरफ़्तार न हो.. 

*📚 (बलग़तुल हैरान, सफ़ह-399, तहरीर: हुसैन अली देवबन्दी)*

*(38) सैयदना इमाम हुसैन रदिअल्लाहु तआ़ला अन्हु की शान में गुस्ताख़ी*

"इमामे हुसैन ने जमाअ़त में तफ़रका (फूट) डाला और जमाअ़त से अलग होकर आप शैतान के हिस्से में चले गए" 

*📚 (रशीद इब्ने रशीद, सफ़ह-225, मौलिफों नाशिर अबू यज़ीद मुहम्मदीन बट लुन्डा बाज़ार लाहौर)*

दूसरी जगह लिखता है *"पस हुसैन बाग़ी और बैत तोड़ने वाले ठहरे"*

   *📚 (रशीद इब्ने रशीद, सफ़ह-184)* 

*तबसरह:-* नबी-ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इमाम हुसैन रदिअल्लाहु तआ़ला अन्हु को सरदारे नौजवानाने जन्नत का लक़ब अता फ़रमाया और आपकी शहादत की पेशीनगोई फ़रमाई। अब ज़रा इनके (देवबंदियों की) गलीज़ सोच पर गौर फरमाएं कि ये लोग नबी-ए पाक के मुक़ाबिले में जन्नत के नौजवानों के सरदार को बाग़ी, म'आज़ अल्लाह अन्धा, शैतान के हिस्से में चले जाने वाला कहते हैं, हालाँकि ये लोग ख़ुद ही देवबंदियों (यानी शैतान के जकड़े हुए) में हैं।

*(39) बन्दा (यानी मैं रशीद अहमद गंगोही) उनकी तकफ़ीर नहीं करता (देवबंदियों का अक़ीदा शीआ़ काफ़िर नहीं)*

"बन्दा (यानी मैं रशीद अहमद गंगोही) उनकी तकफ़ीर नहीं करता (उनको काफ़िर नहीं कहता)"

  *📚(फ़तावा रशीदिया, सफ़ह-296, तहरीर: रशीद अहमद गंगोही)*

 *तबसरह :-* ज़ाहिरन देवबन्दी यही ढोल पीटते हैं कि शीआ़ काफ़िर, शीआ़ काफ़िर, और इन्हीं देवबन्दियों का फ़तवा है कि "जो काफ़िर को काफ़िर न कहे वो ख़ुद काफ़िर है"

*📚(अशुदल अज़ाब, सफ़ह- 8, मतबुआ़ मुज्तबाई जदीद देहली, तहरीर: मौलवी मुर्तुजा हसन)*

अब ख़ुद फैसला करें कि इन लोगों में काफ़िर कौन और मुसलमान कौन ?
और यही रशीद अहमद गंगोही साहब फ़तावा रशीदिया *📚(सफ़ह-285)* पर एक *सवाल:-* ताज़ियादारों और मर्शियाखानों और वे नमाजियों के जनाज़े पढ़ना जाइज है या नहीं?

के *जवाब:-* में लिखते हैं ये लोग फ़ासिक़ हैं और फ़ासिक़ की जनाज़ा में नमाज़ वाजिब है, ज़रूर पढ़ना चाहिए। 

*नोट:-* ताज़ियादारों मर्शियाख्यानों "शिया' को कहते हैं!! 
*"मज़ीद अक़ीदा नम्बर 76 देखिए"।।*
 
  *📚 (उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद व हक़ाइक़, सफ़ह- 11/12/13)*

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