मज़ीद ये कि उनके शैखुल हदीस मौलवी ज़करिया अपनी किताब में लिखते हैं- "जब मेरी उमर गालिबन् 10 बरस थी, मौलाना रशीद अहमद गंगोही के इन्तिक़ाल पर शैखुल हिन्द ने मर्शिया लिखा था0️⃣8️⃣A

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 08-A*
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मज़ीद ये कि उनके शैखुल हदीस मौलवी ज़करिया अपनी किताब में लिखते हैं- "जब मेरी उमर गालिबन् 10 बरस थी, मौलाना रशीद अहमद गंगोही के इन्तिक़ाल पर शैखुल हिन्द ने मर्शिया लिखा था। मेरे वालिद साहब ने कई हज़ार छपवाया और ख़ूब मुफ़्त बाँटा था। मुझे भी क़रीब सब याद था। और ख़ूब मज़े लेकर पढ़ा करता था और मेरे कान में ये पड़ा करता था कि ये शेर अगर हम कहें तो हम काफ़िर हो जाएं मगर चूँकि शैख़ुल हिन्द ने कह दिया इसलिए कोई लब कुशाई नहीं करता।" 

📚 *(अकाबिर उलमा-ए देवबंद इत्तेबा शरीअ़त की रौशनी में सफ़ह-13 से 14 मतबुआ़-उमर पब्लिकेशन्ज उर्दू बाज़ार लाहौर इशाअत: सितम्बर 2004, तहरीर: मौलाना जक़रिया मुसन्निफ़् फ़जाइले आमाल)*

*तबसरह:-* अब ज़रा आखें बन्द करके ठण्डे दिल से ग़ौर फरमाएं कि कितने प्यारे अंदाज़ में इस बात का तज़किरह हो रहा है कि अगर ये मर्शिया कोई और लिखता तो हम उसे काफ़िर कहते लेकिन चूँकि ये मर्शिया शैख़ुल हिन्द मौलाना महमूदुल-हसन देवबन्दी ने लिखा है, इसलिए किसी की जराअ़त नहीं कि वो उन्हें काफ़िर कहे, किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है कि "खिरद का नाम जुनूँ रख लिया, जुनूँ का खिरद..... जो चाहे आपका हुस्न करिश्मा साज़ करे" 
*(ख़िरद के मानी अक़लमन्द और जुनूँ के मानी पागल या बेवकूफ़ होते हैं)* इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि इन लोगों ने दिये गये तमाम अक़ाइद को पढ़ने के बावजूद अपने मौलवियों के अल्फाज़ का हमेशा दिफ़ा (हिफ़ाज़त / बचाव) किया है और उनकी गुस्ताख़ियों के बावजूद उनके अल्फाज़ पर कोई फ़तवा न दिया बल्कि उनके बख़ियादारी करने वाले आला हज़रत इमाम अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा खाँ बरेलवी अलैहिर्रहमा पर बुहतान बाज़ियाँ और इल्ज़ाम तराशियों की भरमार करते रहे, और इनकी दोरंगी देखिए कि इमाम हुसैन रदिअल्लाहु तआ़ला अन्हु के लिए लिखे गये मर्शिये को जलाना ज़रूरी है और अपने मौलवी की शान में मर्शिया लिख डाला, 
           जिसमें उसे ऐसे-ऐसे अलक़ाब दिए जो अम्बिया के लिए बोले जाते हैं। मजीद बरां मौलाना मुहम्मद इदरीस कान्धालवी, मौलाना मीरशाह, मौलाना मुहम्मद यूसुफ़ कामिलपुरी, मौलाना मुहम्मद यामीन उस्ताद जामेअ- इस्लामिया डहाबील और हज़रत मौलाना युसुफ़ साहब बनौरी ने भी दो मर्शिए लिखे।

   *📚(नक्शे दवाँ, सफ़ह-73 ता 74, तहरीर: मुहम्मद उन्जुर शाह, इदारह तालीफ़ाते अशरफ़िया मुलतान)*

  *📚 (उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद व हक़ाइक़, सफ़ह- 10/11)*

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