क्या अल्लाह तआ़ला देखने वाला और सुनने वाला नहीं है 1️⃣0️⃣

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 10*
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*(40) क्या अल्लाह तआ़ला देखने वाला और सुनने वाला नहीं है ?*

 "हालांकि हुनूज़ *अल्लाह तआ़ला* ने उन लोगों को तो देखा ही नहीं जिन्होंने तुममें से जिहाद किया हो... 

    *📚(तर्जुमा क़ुरआन पाक, पारा-4, सूरह आले इमरान आयत: 142, अशरफ़ अली थानवी)*

*(41) क्या अल्लाह तआ़ला भी दाँव करता है....*

 " वह भी दांव करते थे और अल्लाह तआ़ला भी दाँव करता था और अल्लाह का दाँव सबसे बेहतर है" 

 *📚(तर्जुमा क़ुरआन, पारा-1 सूरह अन्फाल, आयत- 30, महमूदुल हसन देवबन्दी)*

*(42) हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मासूमों के सरदार या गुनहगार__?*

"हमने फ़ैसला कर दिया तेरे वास्ते सरीह (वाजेह) ताकि मुआफ़ करे तुझको अल्लाह जो आगे हो चुके तेरे गुनाह और जो पीछे रहे" 

 *📚(तर्जुमा क़ुरआन, पारा-26, सूरह फ़तह, आयत 1 ता 2, अज़ महमूदुल हसन देवबंदी)*

 *तबसरह:-* यानी इन के इस कुफ़्रिया तरजुमा से हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर यह झूठा इल्ज़ाम लगाया कि न सिर्फ़ आपकी पिछली ज़िन्दगी गुनाहों में मुब्तिला थी बल्कि आइंदा ज़िन्दगी भी गुनाहों मे डूबी होगी जब कि अम्बिआ सारे मासूम हैं और हमारे आक़ा उनके सरदार जिन के बारे में अल्लाह फ़रमाता है कि "तुम्हारे साहिब ना बहके, न बे'राह चले और वो कोई बात अपनी ख़्वाहिश से नहीं करते वो तो नहीं मगर वही जो उन्हें आती है" 

  *📚(आयत नं. 2-3 सूरह नजम, पारा-27)* 

    अगर इनका ये अक़ीदा मान लिया जाए तो न सिर्फ़ हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताख़ी बल्कि आयतें आपस में टकराती हैं... 

*(43) अम्बिया को गाँव का चौधरी कह दिया...*

"जैसा कि गाँव का चौधरी और गाँव का जमींदार सो इन मानों में हर पैगम्बर अपनी उम्मत का सरदार है.." 

    *📚(तक़वीयतुल ईमान मय् तज़कीरूल अख़्वान, सफ़ह-85)*

*तबसरह:-* गाँव के चौधरी में तो बहुत सी खामियां मसलन झूठ, नाइंसाफी, बदकारी, मुमकिन हो सकती है ऐसे लोगों को नबी-ए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ मिलाना कहाँ का इंसाफ है ? जबकि अम्बिया मासूम और हर गुनाह से पाक होते हैं।

*(44) देवबन्दी उलेमा को लड़कों से इश्क़ होना, क़ासिम नानौतवी की बारगाह अल्लाह की बारगाह है।*

   "मौलाना मंसूर अली खाँ ने फ़रमाया मुझे एक लड़के से इश्क़ हो गया। रात-दिन उसी के तसव्वुर में गुज़रने लगे। मौलाना नानौतवी से शिकायत की, उन्होंने फ़रमाया-बाद नमाज़ मग़रिब जब मैं नमाज़ से फारिग़ हो जाऊँ, तो आप मौजूद रहें। मैं नमाज़े मग़रिब पढ़कर छत्ता की मस्जिद में बैठा रहा। जब हज़रत सलातुल अव्वाबीन से फ़ारिग़ हुए तो आवाज़ दी, मौलवी साहब! मैंने अर्ज़ किया हज़रत हाजिर हूँ। फ़रमाया हाथ लाओ, मैनें हाथ बढ़ाया, मेरा हाथ अपने बाएं हाथ की हथेली पर रखकर मेरी हथेली से इस तरह रगड़ा जैसे बान बटे जाते हैं। ख़ुदा की क़सम मैंने अयानन देखा कि मैं अर्श के नीचे हूँ और हर चहार तरफ़ से नूर और रौशनी ने मेरा इहाता कर लिया है गोया मैं दरबारे इलाही में हाज़िर हूँ।" 

      *📚(अरवाहे सलासा, हिकायत-251, सफ़ह- 215, मतबुआ़ मकतबा अल हसन उर्दू बाज़ार लाहौर, तहरीर: अमीर शाह खान, कारी मुहम्मद तैयब, अशरफ़ अली थानवी)*

 *तबसरह:-* देवबन्दी मौलवी हाथ पर हाथ रगड़े तो अर्शे मुअ़ल्ला तक पहुँचा दे और इनके अक़ीदे के मुताबिक़ जिसका नाम मुहम्मद या अली हो, यह किसी चीज़ का मुख़्तार नहीं" *(अक़ीदह नम्बर-17)*

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