हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की तौहीन 1️⃣1️⃣
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 11*
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*(47) हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की तौहीन,,*
देवबंदियों के नज़दीक़ रशीद अहमद गंगोही के हक़ीर और झूठे से काले गुलाम का लक़ब यूसुफ़ सानी है महमूदुल हसन देवबन्दी रक़मतराज़ है- क़बूलियत इसे कहते हैं, मक़बूल ऐसे होते हैं, उबैद सउद, इनका लक़ब है यूसुफ़ सानी"
*📚(मर्शिया गंगोही, सफ़ह- 10)*
*तबसरह:-* तो आप सोचें जब मिस्टर गंगोही के हक़ीर गुलाम का लक़ब युसूफ़ सानी है तो उनके अपने हुस्नो जमाल का क्या आलम होगा? *इस शेर में हज़रते यूसुफ़ की सरीह तौहीन है,,,*
*(48) क़ासिम नानौतवी को इल्मे गै़ब....*
"मौलवी अहमद हसन और मौलवी फख़रुल हसन में बाहम मुआ़सराना चशमक (टसल) थी और उसने बाज़ हालात की बिना पर एक मुख़ासिमत और मुनाजिअ़त इख़्तियार कर ली और मौलाना महमूदुल हसन जो असल झगड़े में शरीक न थे, मगर सूरते हाल ऐसी पेश आई कि मौलाना किसी एक जानिब झुक गये और ये वाक़िया तूल पकड़ गया। उसी दौरान में एक दिन अल'सुबह बाद नमाज़े फ़जर, मौलाना रफ़ीउद्दीन ने मौलाना महमूदुल हसन को अपने हुज़रे में बुलाया। (जो दारूल उलूम देवबन्द में है) मौलाना हाज़िर हुए, मौसम सख़्त सर्दी का था। मौलाना रफ़ीउद्दीन ने फ़रमाया पहले मेरा ये रूई का लबादा देख लो। मौलाना (महमूदुल हसन) ने लिबादा देखा तो वह तर था और ख़ूब भीग रहा था। फ़रमाया कि अभी-अभी मौलाना नानौतवी जस्दे उन्सरी *(असली जिस्म के साथ)* मेरे पास तशरीफ़ लाए थे जिससे मैं एकदम पसीना पसीना हो गया और मेरा लबादा तर-बतर हो गया और ये फ़रमाया कि महमूदुल हसन को कह दो वह इस झगड़े में न पड़े। बस, मैंने ये कहने के लिए बुलाया है, मौलाना महमूदुल हसन ने अर्ज़ किया कि हज़रत मैं आपके हाथ पर तौबा करता हूँ और उसके बाद मैं इस किस्से में कुछ न बोलूँगा"
*📚(अरवाहे सलासा, हिकायत- 247, सफ़ह- 212, मतबुआ़ मकतबा अल हसन उर्दू बाज़ार लाहौर, तहरीर: अमीरशाह खाँ, क़ारी मुहम्मद तैयब, अशरफ़ अली थानवी)*
👉 "फ़तावा रशीदिया में रशीद अहमद गंगोही ने लिखा है कि "ये अक़ीदा रखना कि *आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* को इल्मे गै़ब था, सरीह शिर्क है लेकिन अजीब बात है कि इनके बीच मौलवी साहब को क़ब्र में भी पता चल गया कि मदरसा देवबन्द में लड़ाई हुई है और उन्होंने आकर हाजत रवाई भी फ़रमाई जबकि नबी-ए पाक का इल्मे ग़ैब मानने वालों को ये मुशरिक कहते हैं। सिर्फ़ इतना ही नहीं हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में यह अक़ीदा कि जिसका नाम मुहम्मद या अली है वो किसी चीज़ के मुख़्तार नहीं और *हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* मर के मिट्टी में मिलने वाले हैं और इनके मौलवी जब चाहें अपनी क़ब्र से उठ कर अपने जिस्म के साथ जहां चाहें पहुँच सकते हैं बल्कि मरने के बाद देवबन्दिओं की मदद भी फ़रमाते हैं। ये कैसा इन्साफ़ है।
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