देवबन्दी उलेमा का क़श्फ़ और इस्माईल देहलवी का उन पर फ़तवा-ए कुफ़्र 1️⃣2️⃣

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 12*
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*(51) देवबन्दी उलेमा का क़श्फ़ और इस्माईल देहलवी का उन पर फ़तवा-ए कुफ़्र*

एक मर्तबा मौलाना मुहम्मद याक़ूब साहब ने छत्ता की मस्ज़िद में फ़रमाया जबकि लोगों का मजमा था, कि भाई आज हम तो सुबह की नमाज़ में मर जाते, बस कुछ ही क़सर रह गई। अर्ज़ किया गया-क्या हादसा पेश आया। फ़रमाया कि आज सुबह की नमाज़ में सूरए मुज़म्मिल पढ़ रहा था, कि अचानक उलूम का अजीमुश्शान दरिया मेरे क़ल्ब के ऊपर से गुज़रा कि मैं तहम्मुल न कर सका। क़रीब था कि मेरी रूह परवाज़ कर जाए मगर वो दरिया जैसा कि एक दम आया वैसा ही निकला चला गया, इसलिए मैं बच गया। नमाज़ के बाद मैंने ग़ौर किया कि ये क्या मामला था तो मुनकशिफ़ हुआ कि हज़रत मौलाना नानौतवी उन साअ़तों में मेरी तरफ मेढ़ में मुतवज्जेह हुए थे, ये उनकी तवज्ज़ेह का असर था। फ़िर फ़रमाया अल्लाहु अकबर जिस शख़्स की तवज्जह का ये असर है कि उलूम के दरिया दूसरे के क़ल्बों पर मौजे मारने लगे तो उस शख़्स के क़ल्ब की उसअ़त व क़ुव्वत का क्या हाल होगा ?" 

  *📚(अरवाहे सलासा, हिकायत 268)*

*तबसरह:-* लेकिन इसके बर अक़्स अगर देवबंदी मज़हब की बुनियादी किताब तक़वीयतुल ईमान को देखा जाए तो मौलवी याक़ूब तो पक्का मुशरिक और झूठा साबित होता है इस्माईल देहलवी तक़वीयतुल ईमान में लिखता है- कि जो कोई ये दावा करे कि मेरे पास ऐसा कुछ इल्म है कि जब मैं चाहूँ उससे गै़ब की बात मालूम कर लूँ, सो वह बड़ा झूठा है कि दावा ख़ुदाई का रखता है"

   *📚(तक़वीयतुल ईमान, सफ़ह- 21)*

  जैसा कि मौलवी याक़ूब साहब ने न जाने कितने मील दूर बैठे हुए मौलवी क़ासिम नानौतवी को देखकर ये बात दरयाफ़्त कर ली कि उन्होंने मेरी तरफ़ तवज्जो फ़रमाई थी। दूसरी जगह इस्माईल देहलवी ने लिखा- "जो ये अक़ीदा रखे कि जो ख़्याल व वहम मेरे दिल में गुज़रता है वह सबसे वाक़िफ़ है, सो इन बातों से मुशरिक हो जाता है"

     *📚(तक़वीयतुल ईमान, सफ़ह-14)*

       अब इस उसूल के तहत इन दोनों के बारे में आपका क्या ख़्याल है ? तहरीर वाजेह करती है कि दोनों मुशरिक हैं।

*(52) गंगोही हर बात ख़ुदा के हुक्म से करते थे*

        "हज़रत मौलाना गंगोही ने मौलवी मुहम्मद याहिया साहब से फ़रमाया कि फलाँ मसअ़ला शामी में देखो। मौलवी साहब ने अर्ज़ किया कि हज़रत वह मसअ़ला शामी में तो है नहीं। फ़रमाया ये कैसे हो सकता है, लाओ शामी उठा लाओ। शामी (किताब) लाई गई, हज़रत (रशीद अहमद गंगोही) उस वक़्त आँखों से माज़ूर हो चुके थे। शामी के दो सुलुस औराक दाएं जानिब करके और एक सुलुस बाईं जानिब करके इस अन्दाज़ से किताब एक दम खोली और फ़रमाया कि बायीं तरफ़ के सफ़हे पर नीचे की जानिब देखो, देखा तो वह मसअ़ला उसी हिस्से में मौजूद था। सबको हैरत हुई (कि गंगोही साहब तो आँखों से अंधे हैं) हज़रत (गंगोही) ने फरमाया कि हक़ तआ़ला (अल्लाह तआ़ला) ने मुझसे वादा फ़रमाया कि मेरी ज़ुबान से ग़लत नहीं निकलवाएगा" 

       *📚(अरवाहे सलासा, हिकायत- 308, तहरीर: अशरफ़ अली थानवी)*

*तबसरह:-* इस किज़्ब बयानी (झूठ बोलने) पर लोगों को शर्मिन्दा होना चाहिए। पहला सवाल तो ये है, कि अल्लाह तआ़ला के साथ इन्हें हम-कलामी का शर्फ़, कब और कहाँ हासिल हुआ ? कि उसने इनसे वादा फ़रमा लिया, दूसरा सवाल ये है कि इस ऐलान से आख़िर गंगोही साहब का मुद्दआ़ क्या है ? काफ़ी गौरो-फ़िक्र के बाद हम इस नतीजे पर पहुचे हैं कि उन्होंने आम लोगों को ये तआ़स्सुर देने की नाकाम कोशिश की है कि ख़ुदा के यहाँ उनका म़ुकाम बशरियत की सतह, और अम्बिया से भी ऊँचा है क्यूँकि देवबन्दियों का अक़ीदा है कि उनसे भी ग़लती हो सकती है, जैसा कि थानवी साहब लिखते हैं- "तहक़ीक़ की ग़लती विलायत बल्कि नबूवत के साथ भी जमा हो सकती हैं"

  *📚(फ़तावा इम्दादिया, सफ़ह-62, जिल्द-2 मतबुआ़-इन्डिया)*

 ये सवाल भी पैदा होता है कि क्या गंगोही साहब पर वही नाज़िल होती थी ? कि *"अल्लाह"* ने वादा किया?

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