उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद* *व हक़ाइक़ 1️⃣3️⃣

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 13*
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*(54) नबी-ए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का चेहर-ए मुबारक बैयनह अनवर शाह कशमीरी देवबन्दी का चेहरा*

                   *(म'आज़ अल्लाह)*

    "मौलाना अहमद साहब लाहौरी के साहबज़ादे बयान करते हैं- मैंने ख़्वाब में देखा कि आफ़ताब टूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। मग़रिब की नमाज़ हज़रत शाह की खानकाह की मस्ज़िद में अदा की और बाद नमाज़ इन साहबज़ादे ने अपना ये ख़्वाब *(हज़रत अनवर शाह कशमीरी देवबन्दी)* को सुनाया, सुनकर फ़रमाया कि भाई किसी बहुत बड़े आ़लिम की वफ़ात होगी और मुम्किन है कि मेरी ही हो। मौलवी अब्दुल वाहिद साहब ने एक रात ये ख़्वाब देखा कि एक जनाज़ा है और उसके पीछे इतना बड़ा हुजूम (भीड़) जिसे शुमार करना भी मुमकिन नहीं। मख़्लूक़ जनाज़े के पीछे दौड़ रही है और हुजूम (भीड़) बढ़ता ही जा रहा है मैं भी इसी हुजूम में शरीक हो गया और लोगों से पूछा कि ये किसका जनाज़ा है ? बताया गया कि ये जनाब रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जनाज़ा है जिसे लोग तबर्रूकन और हुसूले बरकत के लिए और कान्धा देने के लिए दौड़ रहे हैं। मैनें हुजूम से कहा कि ज़रा ठहरो ठहरो। मैं जनाब रसूले अकरम के चेहरए अनवर की ज़ियारत करना चाहता हूँ। मेरी बेक़रारी पर जनाज़ा मुबारक ज़मीन पर रख दिया गया और हुजूम (भीड़) लाश मुबारक के क़रीब सिमटने लगा। मैनें चेहरए मुबारक से चादर हटाई तो वह बैयनह चेहरा हज़रत मौलाना अनवर शाह कशमीरी रहमतुल्लाह अलैह का था।"

    *📚(नुक़ूशे दवाँ हयाते मुहद्दिस कशमीरी, सफ़ह- 75 मतबुआ़ इदारा तालीफ़ाते अशरफ़िया मुलतान तहरीर: मौलाना मुहम्मद अन्ज़र शाह)*

*तबसरह:👉🏻* ज़रा ग़ौर फ़रमाएँ कि नबी ए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जनाज़ा जा रहा है और जब देखा तो वह अनवर शाह कशमीरी का चेहरा था यानी दूसरे लफ़्ज़ों में अनवर शाह कशमीरी को किस अज़ीम ज़ात के साथ मिला दिया गया। अल्लाह ऐसे गन्दे अक़ाइद से बचाए।

*(55) रशीद अहमद गंगोही देवबन्दी का नबी होने का झूठा दावा*

  आपने (यानी रशीद अहमद गंगोही) कई मर्तबा ब'हैसियत तबलीग़, ये अल्फ़ाज़ ज़बाने फ़ैज़े तर्जुमान से फ़रमाए - सुन लो ! हक़ वही है, जो रशीद अहमद की ज़ुबान से निकलता है और क़सम कहता हूँ कि मैं कुछ नही हूँ मगर इस ज़माने में हिदायत व निजात मौक़ूफ़ (निर्भर) है मेरी इत्तेबा (पैरवी) पर" 

 *📚(तज़क़िरतुर्रशीद, जिल्द- 2, सफ़ह- 17)*

*तबसरह:👉🏻* क्या कोई गै़र ए नबी भी ये कह सकता है ? पासदारी के जज़्बे से अलग होकर सिर्फ़ एक लम्हे के लिए सोचिए, वह यह नहीं कह रहा है कि रशीद अहमद की ज़ुबान से जो कुछ निकलता है वह हक़ है बल्कि उनके जुमले का मफ़हूम ये है कि हक़ सिर्फ़ रशीद अहमद की ज़ुबान से ही निकलता है दोनों का फ़र्क़ यूँ महसूस कीजिए कि पहले जुमले को सिर्फ़ ख़िलाफ़े वाक़ेआ़ कहा जा सकता है, लेकिन दूसरा जुमला तो ख़िलाफ़े वाक़ेआ़ होने के साथ-साथ इस दौर के तमाम पेशवायाने इस्लाम की हक़गोई को एक ख़ुला हुआ चैलेन्ज भी है यानी मतलब ये है कि इस ज़माने में मौलवी रशीद अहमद गंगोही के अलावा किसी की ज़ुबान भी हक़ से आशना नहीं हुई और निज़ात सिर्फ़ गंगोही की ही पैरवी पर है, हालाँकि निजात अल्लाह और उसके रसूल और सहाबा की पैरवी में है।

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