गंगोही का हुक्म ख़ुदा के हुक्म से भारी है* *(म'आज़ अल्लाह)*1️⃣5️⃣
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 15*
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*(62) गंगोही का हुक्म ख़ुदा के हुक्म से भारी है*
*(म'आज़ अल्लाह)*
महमूदुल हसन देवबन्दी, रशीद अहमद गंगोही के बारे लिखता है- "न रुका, पर न रूका, पर न रूका पर न रूका.... उसका जो हुक्म जो हुक्म था, था कज़ाए मुबरम..."
*📚(मर्शिया गंगोही, सफ़ह- 22, मतबुआ़ कुतुबखाना रहीमिया देवबंद, तहरीर: महमूदुल हसन देवबन्दी)*
*तबसरह:-* इस शेर में महमूदुल हसन देवबन्दी ने गंगोही के हर हुक्म को कज़ाए मुबरम की तलवार लिखा। याद रहे कज़ा-ए इला की दो क़िस्में है एक *कज़ा-ए मुबरम,* दुसरी *कज़ा-ए मुअल्लक़* कज़ाए मुबरम, वो हुक्मे इलाही है जो किसी के टाले न टले और किसी दुआ व इल्तेज़ा वग़ैरह से रद् न हो। और कज़ा-ए मुअल्लक़ वो हुक्मे इलाही है, कि किसी और पर उसकी तालीक़ हो, वो हुक्मे इलाही, दुआ वग़ैरह से रुक जाता है यानी हुक्मे इलाही दो क़िस्म की हैं।।
एक वो जो दुआ वग़ैरह से रुक जाता है' और दूसरा नहीं रुकता और हुक्मे इलाही दुआ वग़ैरह से नहीं रुकता उसका नाम कज़ा-ए मुबरम है और देवबंदियों के "शैखुल हिन्द" ने लिखा कि ख़ुदा का वह हुक्म जो दुआ व इल्तिज़ा से नहीं रुकता, रशीद अहमद गंगोही का हुक्म उसकी भी तलवार है, यानी रशीद गंगोही का हुक्म कोई टाल और काट नहीं सकता।
*(63) गंगोही की गुलामी इस्लाम का तमग़ा है*
महमूदुल हसन देवबन्दी, रशीद अहमद गंगोही के बारे में लिखता है "ज़माने ने दिया इस्लाम को दिया दाग़ उसकी फ़ुरकत का... कि था दाग़े गुलामी जिसका तमगा़ए मुसलमानी..."
*📚(मर्शिया गंगोही, सफ़ह-5)*
*तब्सरह:-* यानी रशीद अहमद गंगोही की गुलामी के दाग़ को मुसलमानी का तमग़ा क़रार दिया गया है यानी जिसको उनकी गुलामी का दाग़ लग गया वो मुसलमान हुआ और जिसको गुलामी का दाग़ नहीं लगा वो मुसलमानी के तमग़े से महरूम रहा। दूसरे अल्फ़ाज़ में मुसलमान होने के लिए गंगोही की गुलामी लाज़िमी है।
*(64) गंगोही मसीहाने ज़माँ था,*
*(म'आज़ अल्लाह)*
महमूदुल हसन देवबन्दी अपने गंगोही' के बारे में लिखता है "मसीहाने जमाँ पहुँचा फ़लक पर छोड़कर सबको... छुवा चाहे लहद में वारे क़िस्मत माहे कनआ़नी"
*📚(मर्शिया गंगोही, सफ़ह- 7)*
*तबसरह:-* यानी जैसे हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम आसमान पर उठा लिए गये, उसी तरह गंगोही जो मसीहा-ए जमाँ था वह भी सबको छोड़कर फ़लक पर पहुँच गया और कनआ़न का चाँद *(यानी हज़रते यूसुफ़ अलैहिस्सलाम)* क़ब्र के अन्दर छुप गये। इस शेर में गंगोही को हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम और हज़रते यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से तशबीह देकर अपनी बेलगाम मुहब्बत का इज़हार कौन सा इस्लाम है ?
*(65) गंगोही की मौत विसाले मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नक्शा है..*
*(म'आज़ अल्लाह)*
महमूदुल हसन देवबन्दी, गंगोही के बारे में लिखता है "वफ़ाते सरवरे आलम का नक्शा आप की रेहलत... थी हस्ती गर नज़ीर हस्ती महबूबे सुब्हानी"
*📚(मर्शिया गंगोही, सफ़ह-12, तहरीर: महमूदुल हसन देवबन्दी)*
*तबसरह:👉🏻* यानी गंगोही साहब अल्लाह के महबूब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मिस्ल थे, तो उनकी रेहलत भी
आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की वफ़ात का नक्शा थी!! *"(म'आज़ अल्लाह)"*
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