मौलवी दीवार के पीछे देखता, लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में यह अक़ीदा के उन्हें दीवार के पीछे का इल्म नहीं1️⃣7️⃣

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 17*
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*(75) मौलवी दीवार के पीछे देखता, लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में यह अक़ीदा के उन्हें दीवार के पीछे का इल्म नहीं,* 

मौलाना हबीबुर्रहमान फ़रमाया करते थे कि इस ज़माने में कश्फ़ी हालत दीवान जी की इतनी बढ़ी हुई थी कि बाहर सड़क पर आने जाने वाले नज़र आते रहते थे। दरो- दीवार का हिजाब (पर्दा) उनके दरमियान ज़िक्र के वक़्त बाक़ी नहीं रहता था। 

*📚(हाशिया सवानेह क़ासमी, जिल्द-2, सफ़ह- 73 मतबुआ़ मकतबा रहमानिया लाहौर)*

*तबसरह:-* लेकिन अल्लाह के प्यारे हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में इन देवबन्दियों का यह अक़ीदा है कि अल्लाह के नबी को अपने अन्जाम और दीवार के पीछे का इल्म नहीं"

*📚(बराहीने क़ातिया, सफ़ह 51, तहरीर: ख़लील अहमद अम्बेठवी)*

*(76) मौत पर नानौतवी का इख़्तियार,*

मकामी शीआ़ चौधरियों ने ये तदबीर की के एक नौजवान लड़के का फ़र्ज़ी जनाज़ा बनाया और हज़रत (क़ासिम नानौतवी) से आकर अर्ज़ किया कि हज़रत नमाज़े जनाज़ा आप पढ़ा दें। प्रोग्राम ये था कि जब हज़रत दो तकबीरें कह लें तो साहबे जनाज़ा एक दम उठ खड़ा हो और इस पर हज़रत के साथ इस्तेहज़ा और तमस्ख़ुर (ठठा और मज़ाक़) किया जाये। हज़रते वाला ने माज़रत फ़रमाई कि आप लोग शीआ़ हैं और मैं सुन्नी (देवबन्दी) उसूले नमाज़ अलग-अलग हैं। आपके जनाज़ा की नमाज़ मुझसे पढ़वाने में जाइज़ कब होगी ? शीओं ने कहा कि हज़रत बुजुर्ग हर कौम का बुजुर्ग ही होता है आप तो नमाज़ पढ़ा ही दें। चुनाँचे हज़रत ने मंज़ूर फरमा लिया और जनाज़ा पर पहुँच गये। मजमा था हज़रत एक तरफ़ खड़े थे कि चेहरे पर ग़ुस्से के आसार देखे गये। आँखें सुर्ख़ थीं और गुस्सा चेहरे से ज़ाहिर था। नमाज़ के लिए अर्ज़ किया गया तो आगे बढ़े और नमाज़ शुरू की। दो तकबीरें कहने पर जब तय शुदा प्रोग्राम के मुताबिक़ जनाज़ा में हरकत न हुई तो पीछे से किसी ने मुँह के साथ साहबे जनाज़ा को उठ खड़े होने की सिसकार दी मगर वो न उठा। हज़रत ने तकबीराते अरबा के बाद (चारों तकबीरों के बाद) उसी ग़ुस्से के लहजे में फ़रमाया कि *"अब ये क़यामत की सुबह से पहले नहीं उठ सकता"* देखा गया तो मुर्दा था। 

*📚(हाशिया सवानेह क़ासमी, जिल्द-2 सफ़ह- 71 मतबुआ़ मकतबा रहमानिया, लाहौर)*

 लेकिन नबी-ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुताल्लिक़ देवबन्दियों का अक़ीदा है- "रसूल के चाहने से कुछ नहीं होता" 

*📚(तक़वीयतुल ईमान, सफ़ह- 77, तहरीर: इस्माईल देहलवी)*

*(77) ख़ुदा से मिलने की ख़्वाहिश, थानवी से मिलने की ख़्वाहिश है*

"बजा है तेरी फ़ुरकत में अगर मुज़तर दिलो जाँ है.... ख़ुदा से मिलने का अरमाँ तेरे मिलने का अरमाँ था" 

*📚(अशरफ़ुल सवानेह, जिल्द-4, सफ़ह- 231)* 

*तर्जुमा:-* अगर आपकी जुदाई में मेरे दिल व जान बेचैन हैं तो ये बिल्कुल सही है क्यूँकि अल्लाह से मिलने की ख़्वाहिश ही आपसे मिलने की ख़्वाहिश है यानी आपसे और अल्लाह से मिलना एक ही बात है।

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