हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम देवबन्दियों के बावर्ची*1️⃣8️⃣
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 18*
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*(80) हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम देवबन्दियों के बावर्ची*
*(म'आज़ अल्लाह)*
एक दिन हाजी इन्दादुल्लाह साहब ने ख़्वाब देखा कि आपकी भावज आपके मेहमानों का ख़ाना पका रही हैं कि जनाब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाये और आप की भावज से फ़रमाया, उठ तू इस क़ाबिल नहीं के हाजी इम्दादुल्लाह के मेहमानों का खाना बनाये इसके मेहमान उलेमा हैं। इसके मेहमानों का ख़ाना मैं पकाऊँगां।
*📚(तज़किरतुल रशीद जिल्द-1, सफ़ह- 64 व समाएम इम्दादिया थानवी सफ़ह- 26)*
*तबसरह:-* इस झूठे और मनगढ़ंत ख़्वाब को लिखने और छापने का मक़सद क्या है। यही के उलमा ए देवबन्द का मक़ाम इतना बुलन्द है कि वह ख़ातून इस काबिल नहीं थीं कि देवबन्द के मौलवियों का ख़ाना पकायें, बल्कि उनका ख़ाना पकाने के लिये हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जैसी हस्ती होनी चाहिए। इस तरह म'आज़ अल्लाह हुज़ूर को बावर्ची बना दिया। *(म'आज़ अल्लाह, सुम्मा म'आज़ अल्लाह)*
*(81) हज़रते आयशा सिद्दीक़ा रदिअल्लाहु तआ़ला अन्हा थानवी की नौकरानी की तरह*
*(म'आज़ अल्लाह)*
घर की ख़िदमत करने वाली! शफ़ीक़ अहमद ख़ादिम हुज़ूरे आली ख़्वाब लिखता हूँ जिसका हुज़ूरे आली (यानी थानवी) से वादा करा कर आया था। अहक़र ने ख़्वाब में देखा कि माहे मुबारक रमज़ान शरीफ़ है और इशा का वक़्त है। हज़रत बीबी आयशा रदिअल्लाहु अन्हा हुज़ूरे आली (यानी थानवी) के दरो-दौलत में तशरीफ़ फ़रमा हैं, तरावीह में हुज़ूरे अनवर का क़ुरआन पाक सुनने का इरादा रखते हुए हुज़ूर दरोदौलत में सफ़ुफ़ (सफ़े) के बिछाने और पर्दे डालने के एहतिमाम में रही हैं। इसके बाद अहक़र की आँख खुल गईं"
*📚(असदक़ुल रूया, जिल्द-2, सफ़ह- 50)*
*तबसरह :- (1)* पहला कश्फ़ तो ये था कि बीबी आयशा रदिअल्लाहु अन्हा *(म'आज़ अल्लाह)* थानवी के घर आने वाली हैं, लेकिन उसके ख़ादिम साहब के ख़्वाब ने हज़रते बीबी आयशा रदिअल्लाहु अन्हा को उनके घर पहुँचा दिया। न मालूम कैसे उसको मालूम हुआ कि ये उम्मुल मोमिनीन बीबी आयशा रदिअल्लाहु अन्हा हैं। इसलिए कि ख़्वाब में कोई ऐसा इशारा भी नहीं है जिससे ये मालूम हो।
*2.* ये भी कि बीबी आयशा रदिअल्लाहु अन्हा ऐसी जगह आ गईं जहाँ सफ़ुफ़ और पर्दे का भी इन्तेज़ाम न था और ख़ुद ही ये एहतिमाम करना पड़ा *(म'आज़ अल्लाह)*
*3.* ये भी साबित हुआ कि ऐसा ख़्वाब ख़ादिम ने पहले थानवी को ख़ुद सुनाया और फ़िर उससे वादा लिया कि इसको लिखकर भेजना। चुनांचे उसने वादे के मुताबिक़ लिखकर भेज दिया और थानवी ने उसको छाप दिया (शाया कर दिया) और तहक़ीक़ करना लाज़िमी न समझा कि ऐसा ख़्वाब सच्चा भी हो सकता या नहीं ?
*(82) हूजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम शरीअ़त से बेख़बर थे,*
*(म'आज़ अल्लाह)*
"और अल्लाह तआ़ला ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शरीअ़त से बेख़बर पाया..."
*📚(तर्जुमा : क़ुरआन, सुरह-वद्दुहा, अज: अशरफ़ अली थानवी)*
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