शाने रिसालत और अशरफ़ अली थानवी का इल्म2️⃣0️⃣

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 20*
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*(88) शाने रिसालत और अशरफ़ अली थानवी का इल्म...*

       दारूल उलूम देवबन्द के बड़े जलसा-ए दस्तारबन्दी में बाज़ हज़राते अकाबिर ने इरशाद फ़रमाया कि अपनी जमाअ़त की मसलेहत के लिए हुज़ूर सरवरे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फज़ाइल बयान किये जाएं। ताकि अपने मजमें पर जो वहाबियत का शुबह है, वह दूर हो। ये मौक़ा भी अच्छा है क्यूँकि इस वक़्त मुख़्तलिफ़ तबक़ात के लोग मौजूद हैं। हज़रते वाला (अशरफ़ अली थानवी) ने बा'अदब अर्ज़ किया कि इसके लिए रवायात की ज़रूरत है और वह रवायात मुझको मुस्तहज़िर याद नहीं... 

   *📚(अशरफ़ुल सवानेह, जिल्द-1, सफ़ह- 130, तहरीरः ख्वाजा अज़ीजुल हसन व मौलवी अब्दुल हक़)* 

  *तबसरह:-* हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फज़ाइल का बयान, ईमान बल्कि जाने ईमान है। वह मुसलमान ही क्या, जो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फज़ाइल से न सुनाये। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फज़ाइल का बयान रवायात ही में ही नहीं, क़ुरआन की आयात में भी है, बल्कि क़ुरआन दर असल है ही हुज़ूरे पाक के फज़ाइल पर मुश्तमिल। हज़रत वाला (थानवी) को अगर रवायात याद न थीं तो क़ुरआन की आयात ही से ईमान अफ़रोज मौज़ू पर बयान कर सकते थे। *आला हज़रत बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह* की किताब तजल्ली-उल-यक़ीन ही होती और वह उसे एक नज़र अगर देख लेते तो इस प्यारे मौज़ू पर यूँ ही बयान कर सकते थे कि दरख़्त भी सरकार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फज़ाइल सुनकर झूम उठते लेकिन नहीं, फज़ाइले *मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* का बयान करना उनके नसीब में कहाँ ? और ग़ौर फ़रमाइये कि वो नबी पाक की तारीफ़ मस्लेहत की बिना पर अपने ऊपर वहाबियत के लगे तमग़े (लेबल) को साफ़ करने के लिये बयान करना चाहते थे। आज भी ये लोग दूसरों को धोका देने के लिए महफ़िले सीरतुन्नबी, महफ़िले ज़िक्रे मुस्तफ़ा और *औलिया अल्लाह* कॉन्फ्रेंस वगै़रह कराके अपने आबाओ अजदाद की यही मुनाफ़िक़ाना चाल चलते हैं। और जो इनके क़ाबू में आ जाता है आहिस्ता-आहिस्ता उसे अपने बुरे अक़ाइद में फँसा लेते हैं। 
 
  *📚 (उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद व हक़ाइक़, सफ़ह- 26/27)*

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