देवबन्दियों के मुजद्दिद का बचपन2️⃣1️⃣

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 21*
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 *(89) देवबन्दियों के मुजद्दिद का बचपन...*

 थानवी साहब ने फ़रमाया कि एक रोज़ मैं पेशाब कर रहा था। भाई साहब ने आकर मेरे सर पर पेशाब करना शुरू कर दिया। एक रोज़ ऐसा हुआ कि भाई साहब पेशाब कर रहे हैं मैनें उनके सर पर पेशाब करना शुरू कर दिया। एक मर्तबा मेरठ में मियाँ इलाही बख़्श साहब मरहूम की कोठी में जो मस्ज़िद थी, सब नमाज़ियों के जूते जमा करके उसके शामियाने पर फेंक दिये। नमाजियों में गुल मचा कि जूते क्या हुए, एक शख़्स ने कहा कि ये लटक रहे हैं मगर किसी ने कुछ नहीं कहा। फ़रमाया कि एक साहब थे सीकरी के, हमारी सौतेली वालिदा के भाई बहुत ही नेक और सादा आदमी थे। वालिद साहब ने उनको ठेके के काम पर रख लिया था। एक मर्तबा गर्मी में भूखे प्यासे परेशान घर आये और खाना निकालकर खाने में मशग़ूल हुए। घर के सामने बाजार है। मैंने सड़क पर से एक कुत्ते का पिल्ला छोटा सा पकड़कर घर आकर उनकी दाल की रकाबी में रख दिया। बेचारे रोटी छोड़कर खड़े हो गये और कुछ नहीं कहा। एक रोज़ लड़कों और लड़कियों के जूते जमा करके उनको बराबर रखा और एक जूते को सबके आगे रखा वह गोया के इमाम था और रंग खड़े करके उस पर कपड़े की छत बनाई, वह मस्जिद क़रार दी। 

    *📚(मलफ़ूज़ात हक़ीमुल उम्मत, जिल्द-4, सफ़ह- 260 ता. 262, मतबुआ़ इदारा तालीफ़ाते अशरफ़िया मुलतान)*

*(90) उम्मते देवबन्दिया के हकीमुल उम्मत और मुजद्दिद, अशरफ़ अली थानवी की ज़िन्दगी के चन्द हैरानकुन वाक़िआत*

    अशरफ़ अली थानवी साहब ने फ़रमाया एक दफ़ा एक शख़्स ने मुझसे कहा कि ज़िक्र में मज़ा नहीं आता। मैनें कहा, मज़ा ज़िक्र में कहाँ, मज़ा तो मज़ी (मनी) में होता है जो बीबी से मुजामेअ़त (हमबिस्तरी करने) के वक़्त खारिज होती है, यहाँ कहाँ मज़ा ढूंढ़ते फ़िरते हो''

  *📚(अल इफ़ाज़ात अलयौमिया, जिल्द-6, सफ़ह-61, मतबुआ़ इदारा तालीफ़ाते अशरफ़िया मुलतान)*

*(91) मुजद्दिद-ए देवबन्द का बेनज़ीर किरदार*

    ख़्वाजा अज़ीजुल हसन ने एक दफ़ा हकीमुल उम्मत मौलाना अशरफ़ अली थानवी साहब से अर्ज़ की, कि मेरे दिल में बार-बार ये ख़्याल आता है कि काश मैं औरत होता और हुज़ूर (थानवी) के निकाह में आता। इस इज़हारे मुहब्बत पर थानवी साहब ने ग़ायत दरजे मसरूर (हद से ज़्यादा ख़ुश) होकर बेइख़्तियार हँसते हुए फ़रमाया आपकी मुहब्बत है, सवाब मिलेगा, सवाब मिलेगा।" 

*📚(अशरफ़ुल सवानेह, जिल्द-2, सफ़ह-64)*

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