मुजद्दिद-ए देवबन्द का बेनज़ीर किरदार*2️⃣1️⃣A
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 21-A*
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*(92) मुजद्दिद-ए देवबन्द का बेनज़ीर किरदार*
मौलवी अशरफ़ अली थानवी साहब मौरिख़ 21 जमादिउल अव्वल 1351 हिज़री बाद नमाज़े जुमा अपनी एक मजलिसे मारिफ़त में बेहया औरत की हया की मिसाल देते हुए इरशाद फ़रमाते हैं कि एक शख़्स किसी के मकान पर उसको दरयाफ़्त करने आया तो उसकी बीबी नई ब्याही हुई थी, ज़ुबान कैसे बोले और बतलाना ज़रूर था। इसलिए कहा तो नहीं, लहँगा उठाकर और मूतकर और इस पुर को फाँदकर गई जिससे बतला दिया कि दरिया पार गया है बस ये शर्म कि मुँह से तो नहीं बोली और शर्मगाह दिखा दी"
*📚(अल इफ़ाज़ात अलयौमिया, ज़िल्द-2, सफ़ह- 28)*
*तबसरह :-* ये वाक़ियात मामूली मौलवी के नहीं देवबन्दी फ़िरक़े के मुजद्दिद के हैं।
*(93) थानवी के मामू की कहानी थानवी साहब की ज़ुबानी...*
"अशरफ़ अली थानवी साहब फ़रमाते हैं कि इस हिफ़ाज़ते शरीअ़त का एक और वाक़िया याद आया कि मामू साहब हैदराबाद से अव्वल बार कानपुर तशरीफ़ लाये तो चूँकि जले-भुने बहुत थे, उनकी बातों से लोग बहुत मुतास्सिर हुये। अब्दुर्रहमान साहब मालिक मुतबे निज़ामी भी उनसे मिलने आये, उनके हक़ाएक व मआ़रिफ़ सुनकर बहुत मोतक़िद हुए। अर्ज़ किया कि हज़रत वाज़ फ़माएं ताकि सब मुसलमान मुनतफ़े हो (फ़ायदा उठाएं) मामू साहब ने इसका जवाब अजीब आज़ादाना निराला दिया "कहा कि खाँ साहब मैं ओर वाज़ ? कहाँ सलाह कार कुजाओ मन ख़राब कुजा (कि लोगों की इस्लाह करने वाला वाज़ कहाँ और मैं खराब कहाँ) फ़िर जब ज़्यादा इसरार किया तो कहा कि हाँ एक तरह से कह सकता हूँ. इसका इन्तिज़ाम कर दीजिए। अब्दुर्रहमान खान साहब बेचारे मतीन बुजुर्ग थे, समझे कि ऐसा तरीक़ा क्या होगा कि जिसका इन्तिज़ाम न हो सके। ये सुनकर बहुत इश्तियाक के साथ पूछा कि हज़रत वो तरीक़-ए ख़ास क्या है ? मामू साहब बोले कि मैं बिल्कुल नंगा होकर बाज़ार से होकर निकलूँ इस तरह कि एक शख़्स तो आगे से मेरे उज़वे तनासुल (मर्द के छोटे पेशाब की जगह) को पकड़कर खींचे और दूसरा पीछे से उँगली करे, साथ लड़को की फौज हो और वो ये शोर मचाते जायें भड़वा है रे भड़वा है, रे भड़वा और उस वक़्त मैं हक़ाएक व मआ़रिफ़ बयान करूँ...
*📚(अल इफ़ाज़ात अल योमिया, जिल्द-1, सफ़ह- 2012, मतबुआ़ इदारा तलीफ़ाते अशरफ़िया मुलतान)*
*तबसरह:-* मामू ने तो शरीअ़त से मज़ाक उड़ाया लेकिन भान्जे को क्या सूझी, कि वो हकीमुल उम्मत और मुजद्दिद ज़मान होकर उसके तमस्ख़ुर व मज़ाक को क्यूँ बयान फ़रमाया, लेकिन चूँकि मुजद्दिद साहब बचपन से ही ऐसी लजीज़ (गलीज़) और चटपटी बातों से जी बहलाते थे तो फ़िर क्या करें ?
*(94) अल्लाह तआ़ला को चालबाज़ लिख दिया...*
*(म'आज़ अल्लाह)*
"(उधर तो) वो चाल चल रहे थे और इधर ख़ुदा चाल चल रहा था और ख़ुदा सबसे बेहतर चाल चलने वाला है।"
*(तर्जुमा क़ुरआन सूरह अनफ़ाल् आयत-30, अज़: फ़तेह मोहम्मद जालन्धरी देवबन्दी)*
*📚 (उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद व हक़ाइक़, सफ़ह- 27/28)*
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