गंगोही का क़लम अ़र्श के पार चलता है2️⃣2️⃣A

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         *🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
                           *व हक़ाइक़ 🥀*


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                  *पोस्ट नम्बर:- 22-A*
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*(97) गंगोही का क़लम अ़र्श के पार चलता है..*

    तज़किरतुल रशीद का मुसन्निफ़ लिखता है- "जिस ज़माने में मसला इमकाने किज़्ब पर आपके मुख़ालिफ़ीन ने शोर मचाया और तकफ़ीर का फ़तवा शाया किया। साईं तवक्कल शाह अम्बालवी की मजलिस में किसी मौलवी ने हज़रत इमाम बानी (यानी गंगोही) का ज़िक्र किया और कहा कि इम्कान किज़्ब बारी के क़ाइल हैं ये सुनकर साईं तवक्कल शाह ने गर्दन झुका ली और थोड़ी देर मुराक़िब रहकर मुँह ऊपर उठाकर अपनी पंजाबी जुबान में ये अल्फ़ाज़ फ़रमाए- "लोगों तुम क्या कहते हो ? मैं मौलवी रशीद अहमद गंगोही का क़लम अ़र्श के परे चलता हुआ देख रहा हूँ।"

    *📚(तज़किरतुल रशीद जिल्द- 2, सफ़ह- 322, तहरीर: आशिक़ ईलाही मेरठी)*

 *तबसरह :-* क्या समझे आप ? कहने का मतलब ये नहीं, कि गंगोही साहब की क़लम की लम्बाई अ़र्श की सरहद को पार कर गई बल्कि इस तहरीर से ये दावा करना मक़सूद है कि तक़दीरे इलाही के नौश्ते गंगोही के रूशहाते क़लम से लिखे जाते हैं।

*(98) गंगोही की ज़ुबान, ज़ुबाने इलाही है..*

                    *(म'आज़ अल्लाह)*

  मौलवी विलायत अली साहब फ़रमाते हैं कि मेरे हमराह सफ़रे हज में एक हकीम साहब साईन अंबाला थे जो हाजी (इम्दादुल्लाह) साहब के मुरीद थे। इसी ताअ़ल्लुक़ से उनको हज़रते इमाम रब्बानी (रशीद अहमद गंगोही) के साथ तआ़रूफ़ बल्कि ग़ायत दर्जए अकीदत थी। वो फ़रमाने लगे- मेरा तो ये अक़ीदा है कि, मौलाना (गंगोही) की ज़ुबान से जो बात निकलती है, तक़दीरे इलाही के मुताबिक़ है।"

    *📚(तज़किरतुल रशीद, जिल्द- 2, सफ़ह- 218-219)*

 *तब्सरह:-* ये ख़बर अगर सही है तो इसकी सेहत की दो ही सूरते हैं, या तो गंगोही जुमला मुक़द्दरात पर मुत्तले थे, कि ज़ुबान उसके ख़िलाफ़ खुलती ही नहीं थी या फ़िर उनके मुँह में ज़ुबान नहीं थी, बल्कि कुन की कुंजी थी। जो बात मुँह से निकली वो कायनात का मुक़द्दर बन गई। इन दोनों बातों में से जो बात भी इख़्तियार कर ली जाए देवबन्दी मज़हब पर दीन और दयानत का एक ख़ून ज़रूरी है।
 
  *📚 (उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद व हक़ाइक़, सफ़ह- 28/29)*

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