देवबन्दी बच्चियों के लिए थानवी जी का ख़ास तोहफा2️⃣3️⃣A
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*🥀 उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद*
*व हक़ाइक़ 🥀*
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*पोस्ट नम्बर:- 23-A*
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*(102) देवबन्दी बच्चियों के लिए थानवी जी का ख़ास तोहफा,*
बहिश्ती जे़वर, अशरफ़ अली थानवी ने सिर्फ़ औरतों के लिए लिखी थी लेकिन इसमें जै़ल तिब्बी चुटकुले दर्ज फ़रमाए"
*(1)* एक सूरत ये है कि उज़्व तनासुल (मर्द के छोटे पेशाब की जगह) जड़ में से पतला और आगे से मोटा हो जावे....
*📚(बहिश्ती जे़वर, जिल्द-11, सफ़ह-134 अज़ अशरफ़ अली थानवी)*
*(2)* ख़्वाहिशे नफ़्सानी बहाल ख़ुद हो मगर उज्व तनासुल में कोई नुक्स पड़ जाये इसकी कई सूरतें हैं- एक ये कि सिर्फ़ जअ़फ़ (कमजोरी) और ढ़ीलापन हो...
*📚(बहिश्ती ज़ेवर जिल्द - 11, सफ़ह- 136)*
*(3)* दूसरे ये कि ख़्वाहिश बदस्तूर है मगर उज्व मख़्सूस में फितुर पड़ जाए जिससे मुजामेअ़त पर पूरी क़ुदरत न हो...
*📚(बहिश्ती जे़वर, जिल्द-11, सफ़ह-136)*
*(4)* ख़सिया का ऊपर को चढ़ जाना, इस मर्ज़ से चुनक भी हो जाती है।
*📚(बहिश्ती ज़ेवर, जिल्द-11, सफ़ह- 14)*
*तबसरह:-* देवबन्दी मौलवी जब उज्व मख़्सूस के मुताल्लिक़ तसव्वरात व हालात के असबाक़ अपनी देवबन्दी नौजवान दोशीज़ाओं को पढ़ाते होगें तो फ़िर इसकी तशरीह करते हुए शायद और जब लड़कियाँ इस किताब का मुतालआ़ करती होगीं तो ख़्याल ही ख़्याल में अपने महबूब के उन हिस्सों का तसव्वुर करके कहाँ पहुँच जाती होंगी याद रहे कि किताब बहिश्ती जे़वर सिर्फ़ लड़कियों के लिये लिखी है। चुनाँचे अशरफ़ अली थानवी लिखता है कि मुद्दत दराज़ से इस ख़्याल में था, कि औरतों को एहतिमाम करके इल्में दीन को उर्दू ही मे क्यूँ न हो ज़रूर सिखलाया जाए।
*📚(बहिश्ती जे़वर- 3)*
आख़िर 1320 हिजरी में जिस तरह बन पड़ा खुदा का नाम लेकर इसको शुरू कर दिया और नाम इसकी मुनासिबत मजाक़ निसवान के "बहिश्ती ज़ेवर" रखा गया। अपनी आँखों से देख लूँ कि लड़कियों के दर्स में आमतौर पर ये किताब दाखिल हो गई है। नाज़रीन ख़ुसूसन लड़कियां देखकर खुश हों और मज़ामीन किताबे हिज़ा में उनको ज़्यादा रग़बत हो।
*📚(बहिश्ती जे़वर, जिल्द- 01)*
चुनाँचे आज तक़वीयतुल ईमान के बाद बहिश्ती जे़वर को हर देवबन्दी के घर में होना ज़रूरी समझा जाता है। तजुर्बा कर लें, कि देवबन्दी हो और ये दो किताबें उसके घर में न हों, ये नहीं हो सकता। बल्कि हर देवबन्दी अपनी लड़की को बहिश्ती ज़ेवर जो कई रंगों में छापा गया है, देना लाज़िम समझता है।
*📚 (उलमा ए देवबंद के शैतानी अक़ाइद व हक़ाइक़, सफ़ह- 29/30/31)*
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