नज्दी, वहाबी, ग़ैर मुकल्लिद, देवबन्दी, की हक़ीक़त
🏁🔴🏁🔴🏁🔴🏁🔴🏁🔴
*🥀 नज्दी, वहाबी, ग़ैर मुकल्लिद, देवबन्दी, की हक़ीक़त 🥀*
🔛² *हिन्दुस्तान के मौजूदा फ़िर्के:-*
वहाबी: यह फ़िर्का हिन्दुस्तान में नज्द से आया।
इसकी बुनियाद मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब नज्दी की किताब *“📚 अत्तौहीद”* पर है।
इस फ़िर्के के बानी मौलवी इस्माईल बिन अब्दुल ग़नी बिन वलीउल्लाह देहलवी है।
शाह वलीउल्लाह मुहद्दिसे देहलवी 11वीं सदी के आख़िर में हिन्दुस्तान के बहुत ज़बरदस्त आलिम थे और बहुत बड़े पीर भी।
उनका असर पूरे हिन्दुस्तान पर था बल्कि हिन्दुस्तान के बाहर भी था।
उन्हीं के साहिबज़ादे शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिसे देहलवी हैं जो देहली के बहुत बड़े मरकजी आलिम थे।
मौलवी इस्माईल देहलवी चूंकि शाह वलीउल्लाह का पोता और शाह अब्दुल अज़ीज़ का भतीजा और शागिर्द भी था।
अवाम में बुज़ुर्ग परस्ती आम है जिसके नतीजे में अपने उस्ताद और पीर की औलाद को पीरों की तरह मानने का जज़बा मौजूद है।
इसकी वजह से मौलवी इस्माईल देहलवी के मानने वालों की भी अच्छी ख़ासी तअ़्दाद देहली और इसके इलाक़ों में थी, चूंकि इनके वालिदैन का बचपन में ही इन्तिक़ाल हो गया था इस लिये इनकी कमाहक़्कहू तरबियत नहीं हो सकी।
साथ ही साथ फ़ितरी तौर पर मनचले और शोख़ और नई नई बातों के गिरवीदा थे।
यह वह दौर था कि मुग़लिया सल्तनत दम तोड़ रही थी, अंग्रेज़ पूरे तौर पर उसको अपनी मुट्ठी में ले चुके थे।
सिर्फ़ देहली पर मुग़ल शहन्शाह की हुक़ूमत रह गई थी वह भी बराए नाम, उनकी हैसियत अंग्रेज़ों के वज़ीफ़ा ख़्वार की थी।
पूरे पंजाब पर सिख क़ाबिज़ हो चुके थे।
अल्बत्ता पिशावर और सरहद के लोग आज़ाद थे, मौलवी इस्माईल के अन्दर बादशाह बनने का ख़ब्त पैदा हुआ, उन्हों ने पहले एक किताब लिखी जिसका नाम
*“📚 तक़वियतुल ईमान”* रखा इसमें उन्हीं अक़ाइद को तफ़सील के साथ बयान किया जो इब्ने अब्दुल वहाब नज़्दी की किताब *“📚 अत्तौहीद”* में हैं।
☝️इन अक़ाइद को फैलाने के लिये मुसलमानों में दो तेहरीकें चलाई एक यह कि अल्लाह ही को मान औरों को मत मान, औरों को मानना ख़ब्त है।
दूसरे यह कि क़ुरआने मजीद समझने के लिये बहुत ज़ियादा इल्म की ज़रूरत नहीं, अरबी ज़बान जान लेना काफ़ी है, इसलिये उनको ज़ियादा इल्में दीन हासिल करने की ज़रूरत नहीं।
☝️इससे वह यह फ़ाइदा हासिल करता था कि हर अरबी-दाँ खुद क़ुरआने मजीद को समझे, क़ुरआने मजीद के वो मआनी व मतालिब जो सहाबए किराम और उनके बाद आने वाले मुसलमानों ने बताए हैं उनको मानने की ज़रूरत नहीं।
*"📚 तक़वियतुल ईमान”* में मौलवी इस्माईल देहलवी ने अम्बियाए किराम व औलियाए इज़ाम की शान में बहुत से नाज़ेबा अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किये।
मसलन वो ज़र्रए नाचीज़ से कमतर हैं, आजिज़ो नादान हैं, ज़ियादा से ज़ियादा हमारे बड़े भाई की तरह हैं।
बल्कि यह भी एक जगह लिख दिया कि हर मख़लूक बड़ा हो या छोटा अल्लाह की शान के आगे चमार से भी ज़लील है।
एक जगह लिख दिया कि जिसका नाम मुहम्मद या अली हो वह किसी चीज़ का मालिक व मुख़्तार नहीं।
एक जगह रसूलुल्लाह ﷺ के बारे में लिखा कि वह मर कर मिट्टी में मिल गए।
तमाम एहले सुन्नत व जमाअत का अक़ीदा है कि रसूलुल्लाह ﷺ और दूसरे अम्बियाए किराम व औलियाए इज़ाम क़यामत के दिन अल्लाह अ़ज़्ज़ व जल्ल' की बारगाह में शफ़ाअ़त फ़रमाएंगे।
इन्होंने जगह जगह इसका भी इन्कार किया।
*"📚 तक़वियतुल ईमान”* के बारे में ख़ुद इनका अपना ख़याल यह था कि इस से शोरिश होगी, लड़ाई झगड़ा होगा।
चुनान्चे इनके गुमान के मुताबिक़
*“📚 तक़वियतुल ईमान”* के छपने के बाद लड़ाई और झगड़ा और शोरिश शुरू हुई, उस वक़्त के तमाम उलमाए एहले सुन्नत ने इसका रद लिखा है।
*🎰 कल इसके आगे...........*
👑👑👑👑👑👑👑👑👑👑
*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
https://chat.whatsapp.com/I3NIYUqgOmvBN2r8fDzqIH
Comments
Post a Comment