नज्दी, वहाबी, ग़ैर मुकल्लिद, देवबन्दी, की हक़ीक़त
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*🥀 नज्दी, वहाबी, ग़ैर मुकल्लिद, देवबन्दी, की हक़ीक़त 🥀*
🔛⁴ *ग़ैर मुकल्लिद:-*
देहली में कुछ लोगों ने इनकी तहरीक को क़ुबूल कर लिया था जिन में एक मशहूर आलिम नज़ीर हुसैन देहलवी हैं, यह बहुत क़ाबिल ज़हीन आलिम थे।
इन्होंने अपने तौर पर फ्री (बिला मुआवज़ा) हदीस पढ़ाना शुरू किया और अपने शागिर्दों को वहाबियत की तल्क़ीन की जो अक़ाइद नज्दी वहाबियों के थे वही अक़ाइद इनके भी थे।
बुनियादी तौर पर इन्होंने अपने शागिर्दों को यह समझाया कि इमाम अबू हनीफ़ा, इमाम मालिक, इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाहि तआ़ला अ़लैहि' वग़ैरह ने क़ुरआन व हदीस से जो मसाइल निकाल कर फ़िकह की किताबों में लिखे हैं वो अकसर ग़लत हैं हदीस की किताबें मौजूद हैं हमें चाहिये कि हम बराहे रास्त क़ुरआन व अहादीस से मसाइल निकालें।
☝️ये लोग अपने आपको *“अहले हदीस”* कहते हैं और उर्फे आम में इन्हें ग़ैर मुकल्लिद कहा जाता है।
इन से एहले सुन्नत का सैंकडों मसाइल में इख़्तिलाफ़ है जिसकी तफ़सील बहुत तवील है। “बहरहाल..?
*देवबन्दी:-* मौलवी इस्माईल ही से मुतास्सिर होकर कुछ लोग अक़ीदे में इनके साथ थे लेकिन अमली तौर पर वो अपने आपको हनफ़ी कहते थे, यानी अमलियात में हज़रत इमामे अअज़म अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाहि अ़लैहि' के मुकल्लिद थे और तक़लीद को वाजिब जानते थे।
ऐसे ही लोगों से नानौता ज़िला सहारनपुर के मौलवी क़ासिम (ख़ुद साख़्ता) बानी मदरसए देवबन्द ने तअलीम हासिल की फ़राग़त के बाद देवबन्द में एक मदरसे को दारुल उलूम बनाने की तहरीक चली जो वहाँ के मक़ामी लोगों ने क़ाइम किया था।
यह मदरसा देवबन्द की एक मस्जिद में जिसका नाम छत्ता की मस्जिद है क़ाइम हुआ था।
जब मदरसा जम गया तो मौलवी मुहम्मद क़ासिम देवबन्द पहुंच गया और मदरसे को अपने हाथ में ले लिया और मौलवी रशीद अहमद गन्गोही ने अपने वतन गन्गोह में खान्क़ाह क़ाइम कर ली और पीरी मुरीदी का सिलसिला शुरू कर दिया।
इस तरह वहाबियत की दूसरी शाख़ वुजूद में आई, ये लोग अक़ाइद में वहाबियों के हमनवा हैं।
देवबन्दी और ग़ैर मुकल्लिदीन में अक़ीदे के ऐतिबार से कोई इख़्तिलाफ नहीं इख़्तिलाफ़ है तो सिर्फ़ यह कि ग़ैर मुकल्लिद किसी इमाम की तक़लीद को शिर्क समझते हैं और देवबन्दी तक़लीद को वाजिब जानते हैं और अपने आपको हनफ़ी कहते हैं।
गैर मुकल्लिद पीरी मुरीदी को हराम और बिदअत कहते हैं और देवबन्दी बहुत धूम से पीरी मुरीदी करते हैं।
*☝️इन लोगों का एहले सुन्नत से अक़ीदे का इख़्तिलाफ़* यह है कि तमाम एहले सुन्नत का अक़ीदा यह है कि अल्लाह तआ़ला ने अम्बिया को खुसूसन हज़रत मुहम्मद ﷺ को इल्मे ग़ैब अता फ़रमाया?
और देवबन्दी यह कहते हैं कि अल्लाह तआ़ला के अलावा किसी के लिये इल्मे ग़ैब साबित करना शिर्क है।
तमाम एहले सुन्नत मीलाद, नियाज़, उर्स, फ़ातिहा करते हैं?
और देवबन्दी इसको हराम व बिदअत कहते हैं।
और भी बहुत से इख़्तिलाफ़ात हैं।
*🎰 कल इसके आगे...........*
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