नज्दी, वहाबी, ग़ैर मुकल्लिद, देवबन्दी, की हक़ीक़त

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*🥀 नज्दी, वहाबी, ग़ैर मुकल्लिद, देवबन्दी, की हक़ीक़त 🥀*



🔛³ *इनके चन्द अक़ाइद ये हैं:-*👇
1) खुदाए तआ़ला झूट बोल सकता है।
*📚 रिसाला यकरोज़ी' सफ़हा 145*

2) अल्लाह तआ़ला को ग़ैब का इल्म हर वक़्त नहीं रहता है बल्कि जब चाहता है ग़ैब की बात दरियाफ़त कर लेता है।
*📚 माख़ूज: तकवियतुल ईमान' सफ़हा 26*

3) हर मख़लूक बड़ा हो या छोटा (नबी हो या वली) वह अल्लाह की शान के आगे चमार से भी ज़लील है।
*📚 तक़वियतुल ईमान' सफ़हा 19*

4) अपनी औलाद का नाम अबदुन्नबी, अब्दुर रसूल, अली बख़्श, नबी बख़्श, पीर बख़्श, गुलाम मुहियुद्दीन, गुलाम मुईनुद्दीन रखना शिर्क है।
*📚 तक़वियतुल ईमान' सफ़हा 8*

5) सब अम्बिया और औलिया अल्लाह के सामने एक ज़र्रए नाचीज़ से भी कमतर हैं।
*📚 तक़वियतुल ईमान' सफ़हा 72*

6) रसूलुल्लाह ﷺ को (ग़ैब की) कया ख़बर।
*📚 तक़वियतुल ईमान' सफ़हा 75*

7) रसूले खुदा के चाहने से कुछ नहीं होता।
*📚 तक़वियतुल ईमान' सफ़हा 79*

8) जिसका नाम मुहम्मद या अली है वह किसी चीज़ का मुख्तार नहीं।
*📚 तक़वियतुल ईमान' सफ़हा 52*

9) रसूल का ख़याल नमाज़ में लाना अपने बैल और गधे के ख़्याल में डूब जाने से बदरजहा बदतर है।
*📚 सिराते मुस्तक़ीम*

10) अल्लाह के सिवा किसी को न मान।
*📚 तक़वियतुल ईमान' सफ़हा 23*

11) औलिया व अम्बिया व इमामज़ादा, पीर व शहीद यानी जितने अल्लाह के मुकर्रब बन्दे हैं वो इन्सान ही हैं और बन्दए आजिज़ और हमारे भाई मगर अल्लाह ने उनको बड़ाई दी वो बड़े भाई हुए।
*📚 तक़वियतुल ईमान' सफ़हा 78*

*☝️इन इबारतों से मौलवी इस्माईल की तवक़कोअ सौ फ़ीसद पूरी हो रही है।*

ख़ुद उनके भतीजे मौलाना मूसा, मौलाना मख़सूसुल्लाह ने *“तक़वियतुल ईमान”* का रद लिखा जिसका नाम *📚 मुईदुल ईमान* है।
उस ज़माने में देहली के सबसे बड़े आलिम अल्लामा फ़ज्ले हक़ ख़ैराबादी ने भी इसका रद लिखा जिसका नाम *📚 तहक़ीकुल फ़तवा* है।

अल्लामा फ़ज्ले हक़ ख़ैराबादी वह बुज़ुर्ग हैं जिन्होंने 1857 के हादसे में देहली और लखनऊ दोनों जगह अंग्रेजों से बाक़ायदा जंग की जिसकी सज़ा में जज़ीरए अन्दमान जिला वतन कर दिये गए वहीं उनका इन्तिक़ाल भी हुआ वहीं उनका मज़ार भी है। “बहरहाल..?
उस वक़्त के उलमाए एहले सुन्नत की मुत्तहिदा मुखालिफ़त के नतीजे में मौलवी इस्माईल देहलवी का मज़हबे वहाबियत पनप न सका और मेहदूद दायरे में रह गया।

फिर कुछ दिनों के बाद अंग्रेज़ों से इजाज़त लेकर सिखों के ख़िलाफ़ जिहाद की तहरीक चलाई, इसके लिये पूरे मुल्क का दौरा किया, जिहाद के नाम पर मौलवी इस्माईल के साथ एक भीड़ जमा हो गई और यह इस भीड़ को लेकर सूबए सरहद पहुंचे वहाँ उस वक़्त मुख्तलिफ़ सरदारों की मुन्तशिर हुकुमतें थीं, सरहद के जिन सरदारों ने इनका मज़हब कुबूल किया उनको अपने साथ लिया वरना उन्हें तबाह व बर्बाद कर दिया, यहाँ तक कि वहाँ के कुछ सरदार जिनकी सिखों से मुसलसल जन्ग चली आ रही थी सुलह कर ली और मौलवी इस्माईल बाला कोट में क़त्ल कर दिया गया।

*🎰 कल इसके आगे...........*



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