शिया के बाद देवबंदी सबसे बड़े गद्दार है
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*🥀 शिया के बाद देवबंदी सबसे बड़े गद्दार है 🥀*
🔛 सलमान नदवी इसके नाम से ही कुफ्र की बु आती है पूछो कैसे अरब शरीफ मेँ एक जगह है जिसका नाम नदवा है और उस जगह पर मुनाफिक मुशरिकिन नबी ए पाक सल्ललाहु अलैही वसल्लम को मारने की और उनको तकलिफ देने की साजिश करते थे !
तो वो तो उस दौर के खुले मुनाफिक थे और ये इस दौर के छूपे हुए मुनाफिक है पूछो क्यु देवबन्दियो के दो प्रमुख मदरसे है एक मदरसा ए देवबंद तो दुसरा मदरसा ए नदवा इन मुनाफिक लोगो ने अपने मदरसे का नाम नदवा रखा और ये जानते भी थे कि नदवा किस जगह का नाम है अब तो उस मदरसे के निस्बत से लोग खुद को नदवी कहने लगे !
बाबरी मस्जिद का सौदा करने चला था सलमान नदवी क्युंकी ये मुनाफिक अपने गुस्ताख काफ़िर मुल्लो के नक्शे कदम पर चलते है इनके उलमा ए देवबंद अंग्रेजो के एजेंट और गुलाम थे और ये कांग्रेस और भाजपा आरएसएस के एजेंट है दलील देखिये जमीयत उलमा ए हिन्द के मुफ्ती इल्यास ने 2 साल पहले शिव शंकर को अपना बाप और पैगम्बर मान लिया था वैसे भी ये राम और कृष्ण को नबी मानते है तो ये आरएसएस भाजपा का साथ दे तो ताज्जुब ना करे !
सलमान नदवी ने बाबरी मस्जिद तोड़ने और वहाँ राम मन्दिर बनाने के लिये एक दलील हम्बली मसलक से दी और कहा की हम्बली मसलक में मस्जिद तोड़कर दुसरे जगह पर बनायी जा सकती है अब इस जाहिल ए मुतलक को इतनी अक्ल होनी चाहिये थी कि सुन्नी बरेलवी और देवबन्दी हनफ़ी है ईमाम ए आज़म अबु हनीफ़ा रजियलाहू तअला अन्हु के मुकल्लिद है तो फिर ईमाम अहमद बिन हम्बल के मसलक को क्यु फोल्लो करेंगे मतलब ये हुआ कि अपने फायदे के लिये सब जाइज़ और चाहे शरीअत तोड़नी पड़े तो भी चलेगा ! ( माज़अल्लाह )
देवबन्दियो के आलिमो की अंग्रेजो से दोस्ती मुहब्बत और गुलामी तनखा का सबूत तो ये है इनकी गद्दारी !
1 ) 13 जनवरी 1875 ईसवी लेफ्टिनेंट गवर्नर के एक खुफ़िया मोतिमीद अंग्रेज मुसम्मी पामर ने मदरसा देवबंद का मुआयना किया और मुआयना करने के बाद कहा जो बड़े बड़े कॉलेजों में हजारों रुपये के सर्फ से होता है वह यहाँ कौड़ियो में हो रहा है जो काम प्रिंसिपल हजारो रुपियो में महाना तनखा लेकर करते है वह काम यहाँ एक मौलवी 40 रुपये महाना पर कर रहा है ये मदरसा ख़िलाफ़े सरकार (अंग्रेजो के खिलाफ) नहीं बल्कि मुआफ़िके सरकार ममदुव व मुआविने सरकार हैं !
*📚 सवानेह हयात , मौलाना मुहम्मद अहसन नानोतवी, सफ़ह 217*
अब बताओ खुद अंग्रेज की ये शहादत है कि मदरसा देवबंद ख़िलाफ़े सरकार नही है तो इतना ढिंढोरा क्यों पीटते हो कि मदरसा देवबंद अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ़ सियासी सरगर्मियों का बहुत बड़ा अड्डा था और लिखने वाला तो आपका अपना देवबंदी ही है !
2) मदरसा देवबंद के कारकुनों ओं में अकसरियत ऐसे बुजुर्ग की थी जो गवर्मेन्ट के क़दीम और हाल पेंशरन्स थे जिनके बारे में गवर्मेन्ट को शक करने की कोई गुंजाइश ही न थी !
*📚 हाशिया सवानेह कासमी, जिल्द 2 सफ़ह न 247 , मतबुआ मकतबा रहमानिया लाहोर तहरीर : मनाज़िर अहसन गिलानी*
लो यहाँ साबित भी हुआ कि देवबंदी उलेमा अंग्रेजी हुकूमत से पेंशन लेते थे यानी उनके नौकर थे गुलाम थे खुद अशरफ़ एली थानवी को 600 रुपिये तनखा मिलती थी !
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